विशेष स्थानीय समाचार
बारिश ने थामी रफ्तार तो मौसम साफ होते ही दिन-रात दीये बनाने में जुटे कारीगर, एक दिन में परिवार तैयार कर रहा 1,000 से 1,200 दीये; 80 से 100 रुपये सैकड़ा बिक रहे मिट्टी के दीये।
नई पीढ़ी भी पुश्तैनी हुनर को बचाने में जुटी, रंगीन और डिजाइनर दीयों की बढ़ती मांग के बीच स्थानीय कारीगरों को बाजार से बड़ी उम्मीद।

दुद्धी (सोनभद्र)। दीपावली की जगमगाहट से पहले दुद्धी क्षेत्र के कुम्हार परिवारों के घरों में उम्मीदों का नया उजाला दिखाई देने लगा है। कभी बारिश की बूंदों के चलते थम गया चाक अब मौसम साफ होते ही फिर तेजी से घूमने लगा है। मिट्टी को आकार देकर दीये, घड़े, सुराही, खिलौने और पारंपरिक बर्तन तैयार करने वाले कारीगरों के हाथों में एक बार फिर रफ्तार आ गई है। मल्देवा, बघाडू सहित आसपास के गांवों में कुम्हार परिवार दिन-रात मेहनत कर दीपावली के बाजार के लिए सामान तैयार करने में जुटे हैं। उनके लिए यह सिर्फ त्योहार का सीजन नहीं, बल्कि सालभर की मेहनत को बाजार तक पहुंचाने और परिवार की आजीविका मजबूत करने का सबसे महत्वपूर्ण अवसर है।
पिछले चार-पांच दिनों तक लगातार हुई बारिश ने मिट्टी के कारोबार की रफ्तार पर ब्रेक लगा दिया था। गीली मिट्टी और नमी के कारण दीयों को आकार देने के बाद सुखाना मुश्किल हो गया था। तैयार दीयों के खराब होने का भी डर बना हुआ था। इससे कारीगरों की चिंता बढ़ गई थी। हालांकि, मौसम साफ होते ही परिवार के सभी सदस्य काम में जुट गए हैं। अब चाक की घूमती गति के साथ कारीगरों की उम्मीदें भी रफ्तार पकड़ने लगी है।
बिजली की झालरों के बीच मिट्टी के दीयों की अपनी अलग पहचान
आधुनिक दौर में बाजार रंग-बिरंगी बिजली की झालरों, एलईडी लाइटों और आकर्षक सजावटी सामान से भरा हुआ है, लेकिन मिट्टी के दीयों का महत्व आज भी बरकरार है। दीपावली पर घरों, मंदिरों, दुकानों और प्रतिष्ठानों में मिट्टी के दीये जलाने की परंपरा आज भी लोगों के दिलों में जीवित है। बाजार में सादे दीयों के साथ रंगीन, डिजाइनर और सजावटी दीयों की भी मांग रहती है। पूजा-पाठ के लिए छोटे-बड़े आकार के दीये खरीदे जाते हैं। स्वदेशी उत्पादों और स्थानीय कारीगरों को बढ़ावा देने की सोच भी मिट्टी के दीयों की मांग को नई पहचान दे रही है।
बारिश से प्रभावित कारोबार, अब कम समय में ज्यादा उत्पादन की चुनौती
मिट्टी के कारोबार से जुड़े नंदलाल प्रजापति, अवधनाथ प्रजापति, प्रेमशंकर प्रजापति और पार्वती देवी बताते हैं कि दीपावली और छठ पूजा नजदीक होने के कारण इस समय काम का दबाव काफी बढ़ गया है। लगातार बारिश के चलते उत्पादन प्रभावित हुआ, लेकिन अब मौसम साफ होने के बाद पूरा परिवार दिन-रात मेहनत कर रहा है। दीयों के साथ ढक्कन, खिलौने, घड़े और सुराही भी तैयार किए जा रहे हैं। कम समय में बाजार की मांग पूरी करना उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
अवधनाथ प्रजापति बताते हैं कि दीपावली के दौरान मिट्टी के दीयों की मांग तो बढ़ती है, लेकिन मेहनत के मुकाबले मुनाफा कम मिलता है। एक दिन में परिवार के सभी सदस्य मिलकर करीब 1,000 से 1,200 दीये तैयार कर लेते हैं। फिलहाल सादे मिट्टी के दीये 80 से 100 रुपये प्रति सैकड़ा की दर से बिक रहे हैं। मिट्टी, रंग, ईंधन और अन्य जरूरी सामग्रियों की बढ़ती लागत के कारण कारोबार में बचत पहले जैसी नहीं रह गई है। इसके बावजूद पुश्तैनी परंपरा और अपने हुनर को जीवित रखने की जिम्मेदारी उन्हें लगातार मेहनत करने की प्रेरणा देती है।
इंटर पास राधा ने संभाली चाक की कमान, नई पीढ़ी को हुनर पर गर्व
कुम्हार परिवारों की नई पीढ़ी भी अब पुश्तैनी कारोबार को आगे बढ़ाने में अपनी भूमिका निभा रही है। परिवार की इंटर पास छात्रा राधा अपने पिता के साथ मिट्टी के दीये और बर्तन बनाने में हाथ बंटाती हैं। खास बात यह है कि वह खुद चाक चलाकर दीये और मिट्टी के बर्तन तैयार कर लेती हैं।
राधा का कहना है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि व्यक्ति की सोच और मेहनत उसे पहचान दिलाती है। पुश्तैनी हुनर को आगे बढ़ाना गर्व की बात है। आज की युवा पीढ़ी इस पारंपरिक व्यवसाय से धीरे-धीरे दूर हो रही है, लेकिन यदि युवा आधुनिक डिजाइन और बाजार की मांग के अनुरूप इस कला को अपनाएं तो यह रोजगार का बेहतर माध्यम बन सकता है।
पांच दशक से मिट्टी को दे रहे आकार, 70 वर्षीय नंदलाल के हाथों में आज भी वही हुनर
मल्देवा गांव के करीब पांच दशक से मिट्टी के कारोबार से जुड़े 70 वर्षीय नंदलाल प्रजापति आज भी अपने पुश्तैनी हुनर को पूरी लगन से निभा रहे हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनके हाथ मिट्टी को दीये का आकार देने में पीछे नहीं हटते। उनके लिए मिट्टी का काम महज कमाई का जरिया नहीं, बल्कि परिवार की पीढ़ियों से चली आ रही पहचान और संस्कृति की विरासत है।
नंदलाल प्रजापति बताते हैं कि पहले के समय में मिट्टी के घड़े, मटके, सुराही और अन्य बर्तनों का घर-घर इस्तेमाल होता था। मटके का ठंडा पानी और मिट्टी के बर्तनों में बने भोजन की अपनी अलग पहचान थी। आज आधुनिकता के चलते इनका इस्तेमाल कम हुआ है, लेकिन त्योहारों और धार्मिक आयोजनों में मिट्टी के दीयों की मांग अब भी बनी हुई है।
मिट्टी के दीये जलाकर संस्कृति के साथ पर्यावरण संरक्षण का भी दें संदेश
मिट्टी के दीये भारतीय संस्कृति और परंपरा के प्रतीक हैं। प्राकृतिक मिट्टी से तैयार होने के कारण उपयोग के बाद ये आसानी से पर्यावरण में समाहित हो जाते हैं। वहीं, प्लास्टिक और अन्य गैर-जैविक सजावटी सामग्री कचरे की समस्या बढ़ा सकती है। ऐसे में दीपावली पर मिट्टी के दीयों का उपयोग स्थानीय कारीगरों को आर्थिक सहयोग देने के साथ पारंपरिक कला और पर्यावरण के प्रति जागरूकता का संदेश भी देता है।
स्थानीय कारीगरों की मेहनत को मिले सम्मान, तभी रोशन होंगे उनके घर
दीपावली का त्योहार जहां लोगों के घरों को रोशन करता है, वहीं कुम्हार परिवारों के लिए यह अपनी मेहनत और हुनर को पहचान दिलाने का अवसर भी है। जरूरत है कि लोग बाजार में खरीदारी करते समय स्थानीय कारीगरों के हाथों से बने मिट्टी के दीयों और बर्तनों को प्राथमिकता दें। त्योहार की खरीदारी में स्थानीय उत्पादों को जगह मिलने से छोटे कारीगरों की आमदनी बढ़ेगी और पीढ़ियों से चली आ रही मिट्टी कला को भी नया जीवन मिलेगा।
आखिर दीपावली की असली रौनक केवल बिजली की रोशनी में नहीं, बल्कि उस मिट्टी के दीये में भी है, जिसे किसी कारीगर ने अपनी मेहनत, हुनर और उम्मीदों से तैयार किया है। घरों को रोशन करने वाले इन दीयों के पीछे छिपे कुम्हार परिवारों के संघर्ष और सपनों को सम्मान देना भी इस पर्व की खुशियों का एक अहम हिस्सा है।
फोटो कैप्शन: दीपावली से पहले चाक पर मिट्टी के दीये तैयार करते 70 वर्षीय बुजुर्ग कारीगर नंदलाल प्रजापति।
प्रस्तावित प्रकाशन: डिजिटल भारत न्यूज़ | दुद्धी, सोनभद्र












