Ashadhi Ekadashi 2026: सनातन धर्म में आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी, जिसे आषाढ़ी एकादशी, देवशयनी एकादशी या हरिशयनी एकादशी कहा जाता है, अत्यंत पवित्र और पुण्यदायी मानी जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसी दिन भगवान विष्णु क्षीरसागर में चार माह की योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसके साथ ही चातुर्मास का शुभारंभ होता है, जिसके दौरान विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन और अन्य मांगलिक कार्य स्थगित रहते हैं।

मान्यता है कि इस दिन श्रद्धापूर्वक व्रत, पूजा, जप, तप और दान करने से भगवान विष्णु एवं माता लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है। इससे सुख-समृद्धि, आरोग्य, मानसिक शांति और आध्यात्मिक उन्नति का आशीर्वाद मिलता है।
आषाढ़ी एकादशी पूजा विधि
- प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ पीले या हल्के रंग के वस्त्र धारण करें।
- घर के मंदिर की सफाई कर भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
- भगवान विष्णु को पीले पुष्प, तुलसी दल, चंदन, अक्षत, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- पंचामृत या गंगाजल से भगवान विष्णु का अभिषेक करें।
- “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप करें।
- विष्णु सहस्रनाम, श्रीहरि स्तोत्र या एकादशी व्रत कथा का पाठ करें।
- दिनभर श्रद्धानुसार उपवास रखें तथा सात्विक आचरण का पालन करें। क्रोध, असत्य, निंदा और तामसिक भोजन से बचें।
- संध्या के समय भगवान विष्णु की आरती करें और तुलसी दल अर्पित करें।
- जरूरतमंदों को अन्न, वस्त्र या धन का दान करें।
आषाढ़ी (देवशयनी) एकादशी 2026 शुभ मुहूर्त
- एकादशी व्रत: 25 जुलाई 2026 (शनिवार)
- एकादशी तिथि प्रारंभ: 24 जुलाई 2026, सुबह 09:12 बजे
- एकादशी तिथि समाप्त: 25 जुलाई 2026, सुबह 11:34 बजे
- पारण (व्रत खोलने का समय): 26 जुलाई 2026, सुबह 05:39 बजे से 08:22 बजे तक
- द्वादशी तिथि समाप्त: 26 जुलाई 2026, दोपहर 01:57 बजे
धार्मिक महत्व
देवशयनी एकादशी से भगवान विष्णु चार माह के लिए योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और चातुर्मास प्रारंभ होता है। इस अवधि में साधना, जप, तप, भजन-कीर्तन और दान-पुण्य का विशेष महत्व माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, इस व्रत के पालन से पापों का क्षय होता है तथा भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की कृपा से जीवन में सुख, समृद्धि और मानसिक शांति प्राप्त होती है।
नोट: उपरोक्त जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। विभिन्न पंचांगों में तिथि एवं मुहूर्त में स्थानीय अंतर संभव है। श्रद्धालु अपने क्षेत्र के मान्य पंचांग या योग्य आचार्य से पुष्टि कर सकते हैं।





