July 23, 2026 7:42 am

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क्या हैं AI डेटा सेंटर और क्यों हो रहा है इनका विरोध? जानिए पर्यावरण और संसाधनों पर पड़ने वाला असर

पिछले कुछ वर्षों में कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence-AI) ने दुनिया भर में तकनीकी बदलाव की नई दिशा तय की है। ChatGPT, Gemini, Copilot और अन्य एआई सेवाओं के तेजी से बढ़ते उपयोग के साथ एक और शब्द लगातार चर्चा में है—AI डेटा सेंटर। यही वे विशाल तकनीकी केंद्र हैं जिन पर आधुनिक एआई सिस्टम काम करते हैं।

हाल के महीनों में अमेरिका और यूरोप के कई देशों में नए डेटा सेंटरों के निर्माण का स्थानीय स्तर पर विरोध देखने को मिला है। विरोध करने वाले लोगों का कहना है कि इन केंद्रों के कारण बिजली, पानी और पर्यावरण पर अतिरिक्त दबाव पड़ रहा है। वहीं सरकारें और तकनीकी कंपनियां इन्हें डिजिटल अर्थव्यवस्था और भविष्य की तकनीक के लिए आवश्यक बता रही हैं।

क्या होता है AI डेटा सेंटर?

AI डेटा सेंटर एक ऐसी अत्याधुनिक इमारत या परिसर होता है, जहां हजारों हाई-परफॉर्मेंस सर्वर, स्टोरेज सिस्टम और नेटवर्किंग उपकरण लगातार चलते रहते हैं। यही सर्वर बड़े भाषा मॉडल (Large Language Models) और अन्य एआई प्रणालियों को प्रशिक्षित (Training) करने और उपयोगकर्ताओं के अनुरोधों का जवाब देने का काम करते हैं।

एआई मॉडल जितने बड़े और जटिल होते हैं, उन्हें चलाने के लिए उतनी ही अधिक कंप्यूटिंग क्षमता और बिजली की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि आधुनिक AI डेटा सेंटर पारंपरिक डेटा सेंटरों की तुलना में कहीं अधिक ऊर्जा का उपयोग करते हैं।

डेटा सेंटरों को ठंडा रखना क्यों जरूरी है?

हजारों सर्वर लगातार काम करने के दौरान काफी गर्मी उत्पन्न करते हैं। यदि इस गर्मी को नियंत्रित न किया जाए तो उपकरणों के खराब होने का खतरा बढ़ जाता है।

इसी वजह से डेटा सेंटरों में अत्याधुनिक कूलिंग सिस्टम लगाए जाते हैं। कई केंद्र एयर कंडीशनिंग का उपयोग करते हैं, जबकि कुछ जगहों पर पानी आधारित कूलिंग तकनीक अपनाई जाती है, जिसमें पानी गर्मी को अवशोषित कर सिस्टम को ठंडा रखने में मदद करता है। हालांकि, इस प्रक्रिया में बड़ी मात्रा में पानी की खपत हो सकती है, विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां जल संसाधन सीमित हैं।

पानी और बिजली की बढ़ती मांग बनी चिंता

AI डेटा सेंटरों को लेकर सबसे बड़ी चिंता उनकी बिजली और पानी की बढ़ती मांग को लेकर है।

उदाहरण के तौर पर, गूगल की पर्यावरणीय रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2022 में उसके वैश्विक डेटा सेंटरों ने लगभग 5.6 बिलियन गैलन (करीब 2,120 करोड़ लीटर) पानी का उपयोग किया। विशेषज्ञों का कहना है कि जल संकट वाले क्षेत्रों में ऐसे बड़े डेटा सेंटर स्थानीय जल संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव डाल सकते हैं।

इसी प्रकार, लगातार चलने वाले हजारों सर्वरों के कारण बिजली की मांग भी काफी बढ़ जाती है। कई स्थानों पर स्थानीय समुदायों का कहना है कि इससे बिजली के बुनियादी ढांचे पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है।

ध्वनि प्रदूषण भी बना मुद्दा

कुछ देशों में डेटा सेंटरों के आसपास रहने वाले लोगों ने लगातार चलने वाले कूलिंग सिस्टम और बैकअप उपकरणों से निकलने वाली कम आवृत्ति (Low-Frequency) की आवाज को लेकर भी शिकायतें दर्ज कराई हैं।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार शोर के संपर्क में रहने से तनाव, नींद में बाधा और मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव पड़ सकता है। हालांकि, किसी विशेष बीमारी के जोखिम का आकलन कई अन्य कारकों पर भी निर्भर करता है और इस विषय पर अभी शोध जारी है।

कंपनियां क्या कहती हैं?

तकनीकी कंपनियों का कहना है कि वे ऊर्जा दक्ष (Energy Efficient) सर्वर, नवीकरणीय ऊर्जा (Renewable Energy) और पानी की खपत कम करने वाली नई कूलिंग तकनीकों पर तेजी से काम कर रही हैं। कई कंपनियां पानी के पुनर्चक्रण (Water Recycling) और एयर-कूलिंग जैसी वैकल्पिक तकनीकों को भी अपनाने का दावा करती हैं।

क्या है पूरी बहस?

AI तकनीक के विस्तार के साथ डेटा सेंटरों की संख्या भी तेजी से बढ़ रही है। एक ओर ये केंद्र डिजिटल सेवाओं, क्लाउड कंप्यूटिंग और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के विकास की रीढ़ माने जाते हैं, वहीं दूसरी ओर स्थानीय समुदाय पर्यावरण, जल संसाधनों, ऊर्जा खपत और ध्वनि प्रदूषण को लेकर चिंता जता रहे हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती AI के विकास और पर्यावरणीय संतुलन के बीच उचित संतुलन स्थापित करने की होगी। इसके लिए ऊर्जा दक्ष तकनीकों, नवीकरणीय ऊर्जा और टिकाऊ डेटा सेंटर डिज़ाइन को बढ़ावा देना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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Author: Digital Bharat News

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