Last Updated:
Study Abroad, Study in Europe: अमेरिकी वीजा मिलने में हो रही महीनों की देरी और पढ़ाई के बाद नौकरी ढूंढने की दिक्कतों ने भारतीय स्टूडेंट्स का मूड बदल दिया है. अब वे ‘अमेरिकन ड्रीम’ छोड़ यूरोप का रुख कर रहे हैं, जहां नियम आसान हैं और मौके भी ज्यादा. जानिए क्या है पूरा मामला.
Study Abroad: भारतीय छात्रों का अमेरिकन ड्रीम खत्म हो रहा है
नई दिल्ली (Study Abroad, Study in Europe). कभी हर भारतीय स्टूडेंट की पहली पसंद ‘अमेरिकन ड्रीम’ हुआ करती थी. आईआईटी हो या कोई आम कॉलेज, हर किसी की चाहत होती थी कि बस एक बार अमेरिका का वीजा लग जाए तो जिंदगी सेट है. लेकिन आज हवा का रुख बदल चुका है. अमेरिकी दूतावासों के चक्कर काट-काटकर थक चुके और सख्त इमिग्रेशन नियमों से परेशान होकर अब भारी संख्या में भारतीय छात्र अमेरिका को ‘बाय-बाय’ कह रहे हैं.
‘अमेरिकन ड्रीम’ पर क्यों लगा वीजा का ग्रहण?
पिछले कुछ समय में अमेरिका की इमिग्रेशन पॉलिसी में काफी सख्ती आई है. ट्रंप प्रशासन के आने के बाद नियम और कठोर हो गए हैं. हालात ये हैं कि भारतीय छात्रों को वीजा इंटरव्यू के लिए महीनों इंतजार करना पड़ रहा है. कई बार तो एडमिशन का समय निकल जाता है, लेकिन वीजा स्लॉट ही नहीं मिलता. सोशल मीडिया स्क्रूटनी और बात-बात पर वीजा रिजेक्ट होने के डर ने मानसिक रूप से परेशान कर दिया है. लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी अनिश्चितता बनी रहे तो छात्र दूसरा विकल्प ढूंढने पर मजबूर हो जाते हैं.
पढ़ाई तो पूरी हो गई, पर नौकरी कहां है?
अमेरिका छोड़ने की दूसरी वजह है पढ़ाई के बाद नौकरी में आने वाली दिक्कतें. अमेरिका में F-1 वीजा पर गए छात्रों को OPT (ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग) के तहत काम करने का मौका मिलता है. लेकिन उसके बाद H-1B वीजा पाना लॉटरी से कम नहीं है. कंपनियों के लिए भी विदेशी छात्रों को स्पॉन्सर करना बहुत खर्चीला और कानूनी पेचीदगियों से भरा हो गया है. ऐसे में वे लोकल लोगों को प्रायोरिटी दे रही हैं. इतनी महंगी पढ़ाई का लोन चुकाने के लिए छात्रों को तुरंत नौकरी चाहिए होती है, जो अमेरिका में आसान नहीं है.
यूरोप क्यों बन रहा है भारतीयों की पहली पसंद?
यूएस यूनिवर्सिटीज की बढ़ गई टेंशन
भारतीय स्टूडेंट्स के इस तरह मुंह मोड़ने से अमेरिकी यूनिवर्सिटीज की कमर टूट रही है. अमेरिकी अर्थव्यवस्था में भारतीय छात्र सालाना करीब 9 अरब डॉलर का योगदान देते हैं. वीजा की इस कंगाली और छात्रों की घटती संख्या के कारण कई अमेरिकी कॉलेजों को भारी वित्तीय नुकसान झेलना पड़ रहा है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर वीजा नियमों में ढील नहीं दी गई तो अमेरिका दुनिया के सबसे बेहतरीन ‘ब्रेन’ (प्रतिभाओं) को हमेशा के लिए खो देगा.
About the Author

Deepali Porwal is a seasoned bilingual journalist with 11 years of experience in the media industry. She currently works with News18 Hindi, focusing on the Education and Career desk. She is known for her versat…और पढ़ें












