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90 के दशक में तो रोमांटिक-कॉमेडी फिल्मों का बॉक्स ऑफिस पर जलवा रहा. रोमांटिक फिल्में ने बॉक्स ऑफिस पर जमकर पैसे कमाए. ऐसे समय में दो साल में छोटे बजट की दो ऐसी फिल्में भी आईं जिन्होंने बॉलीवुड के समीकरण बदल दिए. दोनों फिल्में इतनी रियलिस्ट थीं कि सिनेमाघर से निकलने के बाद भी दर्शकों के दिल-दिमाग में इनके किरदार महीनों छाए रहे. बड़े-बड़े सुपर स्टार दोनों फिल्मों के घर पर प्रीमियर रखवाते थे. दोनों ही फिल्मों में गैंगस्टर की कहानी दिखाई गई गई थी. दोनों फिल्मों को दीवानगी का आलम यह है कि 25 साल भी ये उतनी ही फ्रेश लगती हैं.
बॉलीवुड में 90 का दशक म्यूजिकल रोमांटिक फिल्मों के लिए जाना जाता है. दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’, दिल तो पागल है, कुछ-कुछ होता है, राजा हिंदुस्तानी जैसी रोमांटिक फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर सफलता के झंडे गाड़ दिए. इन फिल्मों के गाने आज भी पॉप्युलर हैं. इसी दौर में कुछ फिल्में ऐसी भी आई जो कालजयी साबित हुईं. समय इन्हें अपने बंधन में नहीं बांध पाया. हमेशा के लिए दर्शकों के जेहन में बस गईं. इन फिल्मों के एक-एक सीन, एक-एक डायलॉग दर्शकों के दिल में बस गए. दोनों ही फिल्मों में मनोज बाजपेयी नजर आए थे. दोनों ही फिल्में रियलिस्टिक सिनेमा का अनूठा उदाहरण हैं. ये फिल्में थीं : सत्या और शूल.

1998 में ‘कुछ-कुछ होता है’ ‘प्यार तो होना ही था’ ‘सोल्जर’ ‘बड़े मियां छोटे मियां’ ‘प्यार किया तो डरना क्या’ जैसी रोमांटिक-कॉमेडी फिल्मों का जलवा रहा. इन सभी फिल्मों ने बॉक्स ऑफिस पर जबर्दस्त कमाई की लेकिन इसी साल जुलाई महीने में एक ऐसी फिल्म आई जिसने हिंदी सिनेमा के समीकरण बदल दिए. फिल्म का नाम ‘सत्या’ था जिसका डायरेक्शन-प्रोडक्शन रामगोपाल वर्मा ने किया था. सत्या फिल्म ने मनोज बाजपेयी को अमर पहचान दी. इसी फिल्म में उन्होंने भीखू म्हात्रे का कालजयी किरदार निभाया.

फिल्म की कहानी अनुराग कश्यप-सौरभ शुक्ला और राम गोपाल वर्मा ने मिलकर लिखी थी. फिल्म का प्लॉट 1972 में आई हॉलीवुड मूवी द गॉडफादर से इंस्पायर्ड था. कहानी मुंबई अंडरवर्ल्ड पर भी बेस्ड थी. इस मूवी का एक-एक सीन, लोकेशन इतना रियल था कि दर्शक असली और नकली का फर्क भूल गए थे. सिनेमाघरों से बाहर निकलने के बाद भी दर्शकों के मन में सत्या और भीखू म्हात्रे के किरदार छाए रहे. यही फिल्म की असली ताकत थी. फिल्म में जेडी चक्रवर्ती (सत्या), उर्मिला मांतोडकर, परेश रावल, आदित्य श्रीवास्तव और सौरभ शुक्ला ने अपनी एक्टिंग का जलवा बिखेरा था. फिल्म का एक गाना ‘सपनों में मिलती है, वो कुड़ी मेरी सपनों में मिलती है’ आज भी पॉप्युलर है. गाना गीतकार गुलजार ने लिखा था.
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‘मुंबई का किंग कौन? भीखू म्हात्रे.’ यह डायलॉग दर्शकों के दिल-दिमाग में आज भी ताजा है. जब मनोज बाजपेयी ने यह डायलॉग बोला था तो अनुराग कश्यप उनके पैर पकड़े हुए थे. इसी फिल्म ने बॉलीवुड में रियलिस्टिक सिनेमा का ट्रेंड स्थापित किया. सत्या फिल्म के ज्यादातर एक्टर्स नए थे. रामगोपाल वर्मा ने आगे चलकर अंडरवर्ल्ड की दुनिया पर कंपनी जैसी एक और कल्ट मूवी बनाई. फिल्म में अंडरवर्ल्ड की दुनिया को करीब से दिखाया गया था. सत्या एक ऐसी फिल्म है जो थिएटर्स-टीवी-यूट्यूब पर मूवी खत्म होने के बाद समाप्त नहीं होती. दरअसल यह फिल्म यहीं से शूरू होती है. भीखू म्हात्रे, कल्लू मामा, सत्या के किरदार रह-रहकर दिल-दिमाग में आते हैं.

सत्या फिल्म 3 जुलाई को रिलीज हुई थी. 10 जुलाई को गोविंदा-रवीना टंडन की कॉमेडी फिल्म दूल्हे राजा, 17 जुलाई को विधु विनोद चोपड़ा की करीब, 24 जुलाई को अंगारे और प्यार तो होना ही था जैसी फिल्में रिलीज हुई थीं. सत्या को शुरुआत में दर्शक ही नहीं मिले. मेकर्स को लगा कि फिल्म फ्लॉप हो जाएगी. अचानक एक हफ्ते बाद चमत्कार हुआ और सत्या मूवी ने रफ्तार पकड़ी. सत्या का जादू साल-दर-साल बढ़ता गया. आज यह फिल्म बेस्ट क्राइम मूवी में शुमार है. सत्या फिल्म 1998 में बॉक्स ऑफिस पर पैसे कमाने के मामले में छठवें नंबर पर रही. कई दर्शक इस फिल्म को 50 से ज्यादा बार देख चुके हैं. फिल्म यूट्यूब पर उपलब्ध है.

‘सत्या’ के रिलीज होने के बाद अगले ही साल 1999 में मनोज बाजपेयी की एक और फिल्म आई जिसने दर्शकों का दिल जीत लिया. इस फिल्म के किरदार की सच्चाई ने दर्शकों का दिल जीत लिया था. इस मूवी के क्रेज का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि बॉलीवुड सितारे अपने घरों पर प्राइवेट रूप से प्रीमियर रखते थे. फिल्म में दिखाई गई सच्चाई को देखकर सिहर जाते थे. इस मूवी को बेस्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड मिले थे. इस फिल्म का नाम ‘शूल’ था जिसका डायरेक्शन ईश्वर निवास ने किया था. प्रोड्यूसर राम गोपाल वर्मा ही थे.

‘शूल’ फिल्म की कहानी बिहार की पृष्ठभूमि पर बेस्ड थी. शूल भले ही रिलीज के समय फ्लॉप हो गई थी लेकिन यह फिल्म कल्ट मूवी मानी जाती है. यह एक एक्शन क्राइम फिल्म थी. फिल्म में मनोज बाजपेयी-रवीना टंडन के अलावा सयाजी शिंदे ने बच्चू यादव का यादगार किरदार निभाया था. सयाजी शिंदे की एक्टिंग इतनी रियलिस्टिक थी कि दर्शक उनसे नफरत करने लगते हैं. भूल जाते हैं कि वो सिर्फ एक्टिंग कर रहे हैं.

फिल्म की कहानी रामगोपाल वर्मा और ईश्वर निवास ने लिखी थी. डायलॉग अनुराग कश्यप ने लिखे थे. रामगोपाल वर्मा ने ही फिल्म को नितिन मनमोहन के साथ मिलकर प्रोड्यूस किया था. शूल फिल्म 5 नवंबर 1999 को रिलीज हुई थी. सत्या फिल्म के बाद रामगोपाल वर्मा की यह दूसरी शानदार फिल्म थी. फिल्म में मनोज बाजपेयी ने एक ईमानदार इंस्पेक्टर समर प्रताप सिंह का रोल निभाया था. सयाजी शिंदे ने बच्चू यादव का किरदार निभाया था जो कि हिस्ट्रीशीटर है और अपने शहर का तीन बार का विधायक है. समर प्रताप अकेले ही उसके साम्राज्य को चुनौती देते हैं. फिल्म में रवीना टंडन ने इतनी सहज एक्टिंग की थी कि दर्शक भी उनका यह रूप देखकर हैरान रह गए. फिल्म के एक सीन में जब रवीना टंडन के किरदार की मौत हो जाती है, तब सच में मनोज बाजपेयी रोने लगे थे. उनकी एक्टिंग देखकर पूरी यूनिट भावुक हो गई थी.

फिल्म का क्लाइमैक्स भोपाल स्थित एमपी की पुरानी विधानसभा में शूट हुआ था. फिल्म में शिल्पा शेट्टी का एक आइटम सॉन्ग ‘मैं आई हूं यूपी बिहार लूटने’ खूब फेमस हुआ. फिल्म का क्लाइमैक्स दिमाग घुमा देने वाला था. जया बच्चन ने इस फिल्म का प्रीमियर अपने घर पर रखवाया था. फिल्म के एक सीन में मनोज बाजपेयी की बेटी की मौत हो जाती है. इस सीन को देखकर जया बच्चन सन्न रह गई थीं. करीब 5 करोड़ के बजट में बनी इस फिल्म ने 8.5 करोड़ का कलेक्शन किया था. यह एक फ्लॉप फिल्म साबित हुई थी लेकिन आज यह फिल्म कल्ट मूवी का स्टेटस ले चुकी है.











