प्रशांत महासागर के बीचों-बीच एक ऐसा टाइम बम टिक-टिक कर रहा है, जिसके फटने से धरती पर भयानक परमाणु तबाही का खतरा मंडरा रहा है. रूस-जापान-चीन-अमेरिका जैसे देशों से सटे इस महासागर के ठीक बीचों-बीच कंक्रीट का एक विशालकाय गुंबद बना हुआ है, जिसे ‘रुनिट डोम’ कहा जाता है. इस गुंबद के नीचे कोई खजाना नहीं, बल्कि इंसानी इतिहास का सबसे खतरनाक और जानलेवा परमाणु कचरा भरा पड़ा है. सबसे डरावनी बात ये है कि दशकों पुराना ये कंक्रीट का ढांचा अब जगह-जगह से दरकने लगा है, जिससे जहरीला रेडियोएक्टिव कचरा समुद्र के पानी में लीक होना शुरू हो गया है.
क्या है रुनिट डोम?
अगर गूगल मैप्स पर जाकर ‘रुनिट डोम’ सर्च करेंगे तो आपको नीले समंदर के बीच एक अजीब सा गोल ढांचा साफ-साफ दिखाई देगा. ये गुंबद विशाल है कि इसे अंतरिक्ष से भी आसानी से देखा जा सकता है लेकिन इस खूबसूरत दिखने वाले नीले समंदर के नीचे अमेरिका का वो काला इतिहास छिपा है, जिसने एक हंसते-खेलते द्वीप को हमेशा-हमेशा के लिए श्मशान बना दिया. साल 1946 से 1958 के बीच, अमेरिका ने मार्शल आइलैंड्स पर एक या दो नहीं, बल्कि पूरे 67 परमाणु बमों के परीक्षण किए थे. इनमें से कई परमाणु बम तो हिरोशिमा पर गिराए गए बम से भी सैकड़ों गुना ज्यादा ताकतवर और विनाशकारी थे.
अमेरिका ने मार्शल आइलैंड्स को बना दिया ‘परमाणु श्मशान’
इस परमाणु सनक की कीमत वहां के मासूम आदिवासियों को चुकानी पड़ी. इन महा-विस्फोटों और परीक्षणों के लिए अमेरिका ने वहां के सुदूर द्वीपों पर रहने वाले 300 से ज्यादा स्थानीय लोगों को जबरन उनके घरों से बेदखल कर दिया. उनके हरे-भरे जंगलों और खूबसूरत समुद्र को देखते ही देखते बंजर और जहरीला बना दिया गया. सालों तक चले इन न्यूक्लियर टेस्ट्स की वजह से वहां की मिट्टी, हवा और पानी में इतना ज्यादा रेडिएशन फैल गया कि वहां इंसानों का रहना तो दूर, परिंदों का पर मारना भी नामुमकिन हो गया.
जब साल 1977 आया, तो अमेरिकी सेना ने इस फैले हुए जहर को समेटने की एक अजीबोगरीब प्लान बनाया. सेना के जवानों ने भारी मशीनों की मदद से छह अलग-अलग सबसे ज्यादा दूषित हो चुके द्वीपों से रेडियोएक्टिव मिट्टी, मलबे, इंसानी कचरे और प्लूटोनियम से सने सामान को इकट्ठा करना शुरू किया. इस पूरे जहरीले कचरे को ले जाकर मार्शल आइलैंड्स के ही एक ऐसे गड्ढे में डाल दिया गया, जो खुद एक परमाणु धमाके की वजह से बना था. अमेरिका ने कचरा तो छुपा दिया लेकिन जो तरीका अपनाया, वो आज पूरी दुनिया के लिए जी का जंजाल बन चुका है.
सिर्फ 45 सेंटीमीटर की लेयर और न्यूक्लियर मौत का तांडव
अमेरिकी सेना ने इस विशाल परमाणु मलबे को ढकने के लिए कंक्रीट का एक गुंबद तैयार किया. हैरान करने वाली बात ये है कि इस गुंबद की कंक्रीट की मोटाई सिर्फ 45 सेंटीमीटर रखी गई. उससे भी बड़ी लापरवाही ये थी कि इस गड्ढे के निचले हिस्से में किसी भी तरह का सुरक्षा लाइनर या कंक्रीट की कोटिंग नहीं की गई. इसका मतलब ये हुआ कि वो करोड़ों टन जानलेवा परमाणु कचरा बिना किसी सुरक्षा घेरे के सीधे समुद्र के नीचे मौजूद खोखली और झरझरी कोरल चट्टानों पर टिका हुआ है. समंदर का पानी नीचे से इस कचरे को लगातार छू रहा है और सिर्फ कुछ मीटर की दूरी पर ही पूरा प्रशांत महासागर उफन रहा है.
इसके बाद साल 1986 में अमेरिका ने एक और बड़ा दांव खेला. उसने मार्शल आइलैंड्स को एक स्वतंत्र देश घोषित कर दिया और उसे आजादी दे दी लेकिन आजादी के उस दस्तावेज के साथ अमेरिका ने वहां की सरकार को एक ऐसा तोहफा दिया जो सिर्फ और सिर्फ मौत बांट रहा था. आजादी मिलने के बाद भी वो परमाणु प्रदूषण वहीं रहा, बदला तो सिर्फ कानूनी जिम्मेदारी का हाथ. अमेरिका ने बड़ी चालाकी से इस पूरे जहरीले मलबे की जिम्मेदारी नए और छोटे से देश मार्शल आइलैंड्स के मत्थे मढ़ दी और खुद साफ बचकर निकल गया.
लीक होने लगा है प्लूटोनियम का जहर
आज स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि इस ‘रुनिट डोम’ की छत पर बड़ी-बड़ी और गहरी दरारें साफ-साफ देखी जा सकती हैं. क्लाइमेट चेंज की वजह से समुद्र का जलस्तर लगातार बढ़ रहा है और ऊंची-ऊंची लहरें इस कमजोर हो चुके कंक्रीट के ढांचे से टकरा रही हैं. हालिया वैज्ञानिक जांचों और रिसर्च में इस बात की पुष्टि हो चुकी है कि गुंबद के अंदर बंद रेडियोएक्टिव मटेरियल अब रिसकर बाहर आ रहा है. यह जानलेवा जहर सीधे उस लैगून के पानी में मिल रहा है, जहां आज भी स्थानीय मछुआरे अपने गुजारे के लिए मछलियां पकड़ते हैं.
वहां पकड़ी जाने वाली मछलियों और समुद्री जीवों के शरीर में प्लूटोनियम जैसे खतरनाक तत्वों के अंश मिलने लगे हैं, जिससे वहां के स्थानीय लोगों में कैंसर और कई अजीबोगरीब बीमारियां फैलने का खतरा पैदा हो गया है. ये कोई हादसा या एक्सीडेंट नहीं था, बल्कि ये एक सोची-समझी लापरवाही थी, जिस पर दशकों पहले किसी अधिकारी ने कागजों पर दस्तखत करके हरी झंडी दी थी. अगर ये गुंबद पूरी तरह टूट जाता है तो प्रशांत महासागर का एक बहुत बड़ा हिस्सा हमेशा के लिए दूषित हो जाएगा, जिसका खामियाजा सिर्फ मार्शल आइलैंड्स को ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया को भुगतना पड़ेगा.












