—Advertisement—

क्या है अमेरिका का मिड टर्म चुनाव? अगर ट्रंप की पार्टी हारी तो क्या चली जाएगी राष्ट्रपति की कुर्सी?

Author Picture
Published On: June 23, 2026

—Advertisement—

यह चुनाव कैसे होता है? इसका पूरा गणित समझिए
अमेरिकी सरकार को चलाने के लिए वहां की संसद को कांग्रेस कहा जाता है. इसके दो सदन होते हैं, हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स (निचला सदन, जैसे हमारे यहां लोकसभा) और सीनेट (ऊपरी सदन, जैसे हमारे यहां राज्यसभा). मिड टर्म चुनाव में इन्हीं दोनों सदनों के सांसदों को चुना जाता है.

पहले ये टेबल देखें

इस टेबल से आपको समझ आ गया होगा कि यह कोई छोटा-मोटा चुनाव नहीं है. निचला सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के हर सदस्य को हर दो साल में दोबारा चुनाव लड़ना पड़ता है. इसका मतलब है कि जनता के पास पूरी की पूरी संसद को बदलने का मौका होता है. वहीं सीनेट में, जहां हर राज्य से दो सदस्य होते हैं, वहां की एक-तिहाई सीटों पर इस बार मुकाबला है. इसके साथ ही अमेरिका के 36 राज्यों में नए गवर्नर भी चुने जाएंगे.

डोनाल्ड ट्रंप ने मिड टर्म चुनाव की तैयारी शुरू कर दी है.

राष्ट्रपति का कार्यकाल बचा है, तो क्या ट्रंप की कुर्सी पर कोई असर पड़ेगा?
ये एक ऐसा सवाल है जो हर किसी के मन में उठता है. जब ट्रंप का कार्यकाल 2029 तक है, तो इस चुनाव से उनकी कुर्सी को क्या खतरा हो सकता है? तकनीकी रूप से, मिड टर्म चुनाव में चाहे जो भी नतीजा आए, डोनाल्ड ट्रंप राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे. उन्हें उनके पद से सीधे नहीं हटाया जा सकता. लेकिन, व्यावहारिक रूप से इस चुनाव के नतीजे ये तय करते हैं कि ट्रंप अगले दो साल तक एक ताकतवर राष्ट्रपति रहेंगे या सिर्फ एक ‘लंगड़ी बत्तख’ बनकर रह जाएंगे.

इसके दो बड़े राजनीतिक पहलू हैं.

1. सरकार चलाने में आने वाली रुकावट
अगर इस चुनाव में ट्रंप की रिपब्लिकन पार्टी हार जाती है और विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी को हाउस या सीनेट में बहुमत मिल जाता है, तो ट्रंप के हाथ-पैर बंध जाएंगे. अमेरिका में कोई भी नया कानून बनाने, बजट पास करने या बड़े सरकारी पदों पर नियुक्तियों के लिए संसद की मंजूरी जरूरी होती है. अगर संसद में विपक्ष का कब्जा हो गया, तो वे ट्रंप के हर फैसले को ब्लॉक कर देंगे. ट्रंप कोई भी बड़ा नीतिगत फैसला अपनी मर्जी से नहीं ले पाएंगे.

2. महाभियोग का असली डर
डोनाल्ड ट्रंप के मन में सबसे बड़ा डर इसी बात का है. अमेरिकी संविधान के मुताबिक, निचले सदन यानी हाउस ऑफ रिप्रेजेंटेटिव्स के पास राष्ट्रपति के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव शुरू करने की ताकत होती है. साल 2026 के शुरुआती महीनों में एक रिपब्लिकन बैठक के दौरान ट्रंप ने खुद अपने सांसदों से बड़ी साफगोई से कहा था,

“आपको हर हाल में यह मिड टर्म चुनाव जीतना होगा. क्योंकि अगर हम मिड टर्म नहीं जीते, तो विपक्ष वाले मुझे इंपीच करने का कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेंगे.”

ये बयान दिखाता है कि ट्रंप को अच्छी तरह पता है कि अगर संसद उनके हाथ से निकल गई, तो उनकी राष्ट्रपति की कुर्सी पर सीधे खतरा मंडराने लगेगा. विपक्षी पार्टी उन पर पुराने और नए मामलों को लेकर जांच बिठा देगी और उनका बाकी का दो साल का कार्यकाल कोर्ट और कचहरी के चक्कर काटने में ही बीत जाएगा.

इस मिड टर्म चुनाव में ट्रंप के सामने खड़े सबसे बड़े मुद्दे क्या हैं?
साल 2026 के इस चुनावी समर में ट्रंप की राह आसान नहीं है. अमेरिकी जनता इस वक्त कई मोर्चों पर परेशान है, और उनका यह गुस्सा ट्रंप के खिलाफ जा सकता है. इस चुनाव के चार सबसे बड़े मुद्दे इस तरह हैं.

1. महंगाई और आम अमेरिकी नागरिक की जेब
अमेरिकी वोटरों के लिए सबसे बड़ा मुद्दा हमेशा उनकी जेब होती है. साल 2025 और 2026 की शुरुआत में मिडिल ईस्ट में फैले तनाव और ईरान के साथ बढ़ी तल्खी की वजह से अमेरिका में गैस, तेल और बिजली की कीमतें बहुत ज्यादा बढ़ गई हैं. आम अमेरिकी नागरिक इस बात से परेशान है कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी लगातार महंगी होती जा रही है. ब्रूकिंग्स इंस्टीट्यूशन के एक्सपर्ट्स के मुताबिक, ‘अफोर्डेबिलिटी’ यानी चीजों का बजट में होना ही इस चुनाव का सबसे बड़ा निर्णायक फैक्टर बनने जा रहा है.

2. गिरती हुई लोकप्रियता और ग्रामीण अमेरिका का मूड
साल 2026 के शुरुआती महीनों में आए सर्वे रिपोर्ट बताते हैं कि राष्ट्रपति ट्रंप की अप्रूवल रेटिंग यानी लोकप्रियता में बड़ी गिरावट आई है. सबसे चिंता की बात यह है कि ग्रामीण अमेरिका, जो हमेशा से ट्रंप का सबसे मजबूत वोट बैंक रहा है, वहां भी उनके समर्थन में भारी कमी देखी गई है. ऐसे में रिपब्लिकन पार्टी के भीतर ये घबराहट है कि अगर उनके अपने पारंपरिक वोटर ही नाराज हो गए, तो संसद की बची-खुची सीटें भी हाथ से निकल जाएंगी.

3. वोटिंग राइट्स और चुनावी नियमों पर छेड़ा गया संग्राम
ट्रंप प्रशासन ने मार्च 2026 में एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर जारी कर मेल-इन वोटिंग यानी डाक के जरिए वोट डालने के नियमों को बेहद कड़ा कर दिया था. ट्रंप का दावा है कि इससे चुनावी गड़बड़ी रुकती है, लेकिन विपक्ष और कई मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यह जानबूझकर आम लोगों को वोट डालने से रोकने की साजिश है. इस मुद्दे को लेकर अमेरिका के 23 डेमोक्रेटिक राज्यों ने सरकार के खिलाफ अदालत में केस दर्ज कर दिया है. इस कानूनी लड़ाई ने अमेरिकी समाज को दो हिस्सों में बांट दिया है.

4. युद्ध की थकान और अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर नाकामी
अमेरिकी जनता अब दुनिया भर के युद्धों में अपने पैसे और सैनिकों को झोंकने से थक चुकी है. ईरान के साथ पिछले एक साल से चल रही तनातनी और सैन्य टकराव ने अमेरिकी जनता के मन में यह डर पैदा कर दिया था कि कहीं देश एक और लंबे और अंतहीन युद्ध में न फंस जाए. लोग चाहते थे कि सरकार विदेशों में लड़ने की जगह अपने देश की अंदरूनी समस्याओं पर ध्यान दे.

सबसे बड़ा सवाल: क्या ईरान से पीस डील के पीछे असली गेम मिड टर्म चुनाव ही है?
ये अभी का सबसे जरूरी सवाल है. मार्च 2026 में डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर बड़े कड़े शब्दों में लिखा था कि “ईरान के बिना शर्त सरेंडर के अलावा कोई डील नहीं होगी!” लेकिन जून आते-आते उन्होंने ईरान के साथ एक समझौते पर दस्तखत कर दिए और लिखा, “दुनिया के जहाजों, अपने इंजन शुरू करो. तेल को बहने दो!” मगर आखिर तीन महीनों में ऐसा क्या बदल गया कि ट्रंप को अपने कदम पीछे खींचने पड़े? इसका सीधा जवाब है मिड टर्म चुनाव में हार का डर.

इस पूरे खेल को समझने के लिए हमें फॉरेन पॉलिसी एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव की बात समझनी होगी, जिन्होंने कहा था इस पूरे युद्ध और टकराव में ईरान एक ‘विजेता’ की तरह उभरा है. इसके पीछे की क्रोनोलॉजी को समझिए.

होर्मुज का वो संकट जिससे कांप गई वाशिंगटन की सरकार
ईरान के पास दुनिया का सबसे बड़ा रणनीतिक हथियार है, होर्मुज जलडमरूमध्य. अमेरिका ने अपनी पूरी ताकत लगा दी. अपनी सबसे बड़ी नौसेना (नेवी) वहाँ तैनात कर दी, घातक मिसाइलें लगा दीं, लेकिन एक्सपर्ट रोबिंदर सचदेव के मुताबिक, अमेरिका अपनी पूरी मिलिट्री पावर के बावजूद होर्मुज के रास्ते को दोबारा सुरक्षित तरीके से नहीं खुलवा पाया. ईरान के छोटे ड्रोन्स और समुद्री बारूदी सुरंगों के सामने अमेरिकी नौसेना बेअसर साबित हो रही थी.

अमेरिकी गैस स्टेशनों की कतारें और ट्रंप का चुनावी गणित
जैसे ही होर्मुज का रास्ता बंद हुआ, दुनिया भर में कच्चे तेल की सप्लाई रुक गई. इसका सीधा असर अमेरिकी शहरों पर पड़ा. वहां पेट्रोल-डीजल की कीमतें आसमान छूने लगीं.

डोनाल्ड ट्रंप को अच्छी तरह पता था कि अगर नवंबर के चुनाव तक अमेरिका में तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ी रहीं, तो अमेरिकी जनता उन्हें और उनकी पार्टी को कभी माफ नहीं करेगी. अमेरिकी इतिहास गवाह है कि जब-जब देश में तेल की कीमतें बढ़ती हैं, तब-तब सत्ताधारी पार्टी चुनाव हार जाती है. ट्रंप किसी भी कीमत पर मिड टर्म चुनाव से पहले अमेरिकी बाजार को शांत करना चाहते थे. अपनी गिरती लोकप्रियता और चुनाव में संभावित हार को देखते हुए ट्रंप के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा. उन्हें हर हाल में एक ऐसी ‘राजनयिक जीत’ चाहिए थी जिसे दिखाकर वे अमेरिकी जनता से कह सकें, “देखो, मैंने युद्ध भी रोक दिया और समंदर का रास्ता भी खुलवा दिया, अब तेल की कीमतें कम हो जाएंगी.”

Related News
Home
Facebook
Telegram
X