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‘आतंकियों’ के नाम पर अफगान बच्चों का कत्लेआम? पाकिस्तान पर उठे गंभीर सवाल, सोते हुए परिवारों पर बरसाए बम

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Published On: June 23, 2026

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वॉशिंगटन. पिछले एकाध साल में अफगानिस्तान पर पाकिस्तान की ओर से किए गए हमलों में कई नागरिक मारे गए हैं. इनमें बच्चों की संख्या भी ठीक-ठाक थी. एक रिपोर्ट में इन हमलों पर अमेरिका से खास अपील की गई है. आंकड़े सामने रखते हुए मांग की गई है कि वो पाकिस्तान को सैन्य कार्रवाई करने से रोके. संयुक्त राष्ट्र सहायता मिशन इन अफगानिस्तान (यूएनएएमए) के अनुसार, पिछले सप्ताह पाकिस्तान ने करीब एक महीने की अपेक्षाकृत शांति के बाद अफगानिस्तान में नए हवाई हमले किए, जिनमें करीब 13 नागरिक मारे गए और 10 अन्य घायल हो गए.

इस्लामाबाद ने इन हमलों की पुष्टि करते हुए दावा किया कि उनका निशाना आतंकियों के ठिकाने थे और इसमें तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) से जुड़े 26 लड़ाके मारे गए. हालांकि, अमेरिकी ऑनलाइन पत्रिका रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, इन दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है. रिपोर्ट में कहा गया कि वॉशिंगटन को इस्लामाबाद से अपने दावों के समर्थन में सबूत मांगने चाहिए, हमलों में हुई मौत की स्वतंत्र जांच कराई जानी चाहिए और यह स्पष्ट करे कि आतंकवाद के खिलाफ अभियान में मदद का बहाना बनाकार मासूम अफगान नागरिकों को मारना क्या सही है?

रिपोर्ट में कहा गया, “यह पहली बार नहीं है जब पाकिस्तान ने दावा किया है कि उसके हमलों का निशाना टीटीपी था, हालांकि अपने दावे के समर्थन में कोई वो कोई सबूत पेश नहीं कर पाया. मार्च में पाकिस्तानी हवाई हमलों ने काबुल स्थित ओमिद ड्रग पुनर्वास केंद्र को निशाना बनाया था, जहां संयुक्त राष्ट्र के अनुसार करीब 143 लोग मारे गए थे. इसके बावजूद इन हमलों की अंतरराष्ट्रीय समुदाय, यहां तक कि अमेरिका ने भी नाममात्र की आलोचना की है. वो भी तब जब राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में पाकिस्तान और अमेरिका के संबंध और मजबूत हुए हैं.”

रिपोर्ट में अफगानिस्तान के खोस्त प्रांत के निवासी हाजी हाफिजुल्लाह का भी जिक्र है. जिन्होंने बताया कि हमलों के बाद उन्होंने अपने बेटे और अन्य ग्रामीणों के साथ पूरी रात मलबे से शव निकालने में बिताई थी. उन्होंने कहा, “एक परिवार ने अपने सात बच्चों को खो दिया. उनकी उम्र तीन से 15 साल के बीच थी. उसी परिवार की एक महिला और एक पुरुष की भी मौत हो गई. वे सभी सो रहे थे. उनका किसी भी संगठन से कोई संबंध नहीं था. वे लड़ाके नहीं थे, बल्कि साधारण और गरीब लोग थे.”

खोस्त के एक अन्य निवासी इस्मतुल्लाह ने पाकिस्तान के टीटीपी को निशाना बनाने के दावे पर सवाल उठाते हुए कहा, “पाकिस्तान कहता है कि वह आतंकवादियों से लड़ रहा है, तो फिर आज हमने बच्चों को क्यों दफनाया? अगर ये बच्चे आतंकवादी थे तो उनकी बंदूकें दिखाइए, उनका अपराध बताइए. उनका एकमात्र अपराध यह था कि वे अफगान थे, गरीब थे और उस सीमा के पास सो रहे थे, जिस पर पाकिस्तान जब चाहे बमबारी करने का अधिकार समझता है.”

रिपोर्ट में कहा गया कि तालिबान या टीटीपी को लेकर पाकिस्तान की नाराजगी उसे अफगानिस्तान के खोस्त, कुनार और पक्तिका प्रांतों के ग्रामीणों को निशाना बनाने का अधिकार नहीं देती. इसमें जोर देकर कहा गया कि आतंकवाद-रोधी अभियान ‘गरीब परिवारों की हत्या का लाइसेंस’ नहीं बन सकते.

अंतरराष्ट्रीय समुदाय से अफगान नागरिकों की मौत को ‘सामान्य पृष्ठभूमि की घटना’ की तरह नजरअंदाज न करने की अपील करते हुए इस्मतुल्लाह ने कहा, “हम दुनिया से हमारे लिए लड़ने की मांग नहीं कर रहे, हम केवल सच बोलने की अपील कर रहे हैं. खोस्त या पक्तिका में मारा गया बच्चा और मां भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं. यदि मानवाधिकार वास्तव में मायने रखते हैं, तो उन्हें अफगान लोगों के लिए भी मायने रखना चाहिए.”

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