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अगर फुटबॉल देखते हैं तो भारत के इस फैन की कहानी जरूर पढ़ें, इन्होंने जो किया वो पागलपन की इंतेहा है!

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Published On: June 26, 2026

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साल 1994… फुटबॉल वर्ल्ड कप का क्वार्टर फाइनल मैच चल रहा था. बुल्गारिया ने जैसे ही जर्मनी को हराकर टूर्नामेंट से बाहर किया, भारत के असम में बैठे एक शख्स का दिल चकनाचूर हो गया. उसने उसी वक्त गुस्से और जज्बात में आकर ‘पासपोर्ट स्कॉच’ की एक महंगी बोतल खरीदी और कसम खाई, ‘जब तक मेरी पसंदीदा टीम जर्मनी दोबारा वर्ल्ड कप नहीं जीतेगी, इस बोतल को कोई हाथ नहीं लगाएगा!’ इसके बाद उसने अपने घर का आंगन खोदा और उस बोतल को जमीन के नीचे दफन कर दिया.

आज जब दुनिया भर में फुटबॉल वर्ल्ड कप का बिगुल बज चुका है, असम के कार्बी आंगलोंग जिले के ‘दीफू’ शहर से आई यह कहानी इंटरनेट पर तहलका मचा रही है. पुतुल साल 1986 से लगातार हर वर्ल्ड कप को एक त्योहार की तरह मनाते आ रहे हैं. इस बार वे लगातार 11वीं बार अपने घर पर वर्ल्ड कप की लाइव स्क्रीनिंग होस्ट कर रहे हैं.

सीन 1: 20 साल का लंबा इंतजार और वो ऐतिहासिक खुदाई, साल 2014)
इस कहानी की शुरुआत भले ही एक टूटे हुए दिल से हुई थी, लेकिन इसका क्लाइमेक्स बेहद शानदार था. साल 1994 में जमीन में गाड़ी गई वह बोतल कोई एक-दो साल नहीं, बल्कि पूरे 20 साल तक मिट्टी के नीचे दबी रही. इस बीच 1998, 2002, जहां जर्मनी फाइनल में हारा, 2006 और 2010 के वर्ल्ड कप आए और चले गए. हर बार पुतुल को उम्मीद जगती, लेकिन सेलिब्रेशन टल जाता.

आखिरकार वो पल आ ही गया: साल 2014 में जब मारियो गोत्जे के एक्स्ट्रा टाइम गोल की बदौलत जर्मनी ने अर्जेंटीना को हराकर चौथी बार वर्ल्ड कप जीता, तो दीफू शहर में पुतुल के घर के आंगन की खुदाई शुरू हुई. पुतुल ने 20 साल पुरानी वो स्कॉच की बोतल बाहर निकाली और अपनी कसम पूरी की. इस एक वाकये ने उन्हें रातों-रात भारतीय फुटबॉल फैंस के बीच एक ‘लिविंग लेजेंड’ बना दिया.

सीन 2: 1986 का वो पहला प्यार, जिसने नाम बदल दिया
पुतुल डेका को आज उनके असली नाम से कम, बल्कि ‘पुतुल जर्मन’ के नाम से ज्यादा जाना जाता है. पुतुल की यह दीवानगी साल 1986 के वर्ल्ड कप से शुरू हुई थी. उस दौर में उन्होंने वेस्ट जर्मनी की टीम को खेलते देखा और उनके फैन बन गए. फुटबॉल में अक्सर फैंस टीमें बदलते रहते हैं, लेकिन पुतुल की वफादारी पिछले 11 वर्ल्ड कप से आज तक नहीं डगमगाई. जर्मनी जीते या हारे, उनका दिल सिर्फ अपनी ‘मानशाफ्ट’ यानी जर्मन टीम के लिए धड़कता है.

सीन 3: घर का आंगन ही बन गया ‘जर्मन स्टेडियम’
एक सच्चे फैन की दीवानगी सिर्फ कसम खाने तक सीमित नहीं रहती. पुतुल ने अपनी इस दीवानगी को पूरे शहर का त्योहार बना दिया है. पुतुल ने अपने घर के आंगन को एक प्रॉपर फुटबॉल देखने वाले एरिना में बदल दिया है, जिसे लोग प्यार से ‘जर्मन स्टेडियम’ कहते हैं. वर्ल्ड कप के मैचों के लिए यहां बड़ी स्क्रीन्स लगाई गई हैं, भाग लेने वाले देशों के झंडे लहरा रहे हैं और चारों तरफ फुटबॉल के दिग्गजों के पोस्टर्स लगे हैं. इस बार पुतुल ने असम के मशहूर सिंगर और फुटबॉल प्रेमी जुबीन गर्ग को भी अपनी सजावट के जरिए एक खास ट्रिब्यूट दिया है.

सीन 4: वर्ल्ड कप की ओपनिंग नाइट, 250 मेहमान और पूरी-सब्जी का लंगर
वर्ल्ड कप की ओपनिंग नाइट पर पुतुल के इस ‘जर्मन स्टेडियम’ में जश्न का माहौल बिल्कुल अलग लेवल पर हुआ. एंट्री शाम 6:30 बजे थी. शाम को एक पूर्व नेशनल फुटबॉलर मुख्य अतिथि बनकर पहुंचे. फैंस के सामने 4 फीट ऊंची वर्ल्ड कप की एक चमचमाती नकली ट्रॉफी का अनावरण हुआ और सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुए.

रात 8:30 बजे दावत: फुटबॉल के इस महाकुंभ में पेट-पूजा का भी पूरा इंतजाम है. पुतुल के घर पर आमंत्रित किए गए करीब 250 मेहमानों के लिए गरमा-गरम पूरी-सब्जी का लंगर शुरू हो चुका है.

रात 10:30 बजे (गेम ऑन): जैसे ही रात के सन्नाटे को चीरती हुई टीवी स्क्रीन पर वर्ल्ड कप की पहली सीटी बजती है, पूरी-सब्जी खा रहे फैंस अपनी जर्सी संभालकर स्क्रीन के सामने जम जाते हैं.

पुतुल जर्मन की यह कहानी बताती है कि फुटबॉल सिर्फ 90 मिनट का खेल नहीं है. यह एक ऐसा नशा है जिसके लिए कोई इंसान 20 साल तक स्कॉच की बोतल जमीन में गाड़ सकता है और अपने घर को पूरे शहर के लिए स्टेडियम बना सकता है.

रिपोर्ट: निलॉय भट्टाचार्जी, न्यूज़18 असम

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