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कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी की साइंटिस्ट डॉ. जूली एली ने जेब्रा फिंच चिड़िया की भाषा को डिकोड कर लिया है. इसके लिए उन्हें 1 लाख डॉलर का कॉलर-डुलिटिल प्राइज मिला है. जूली ने 15 साल की रिसर्च के बाद चिड़ियों के 11 मुख्य शब्दों को खोजा है. मशीन लर्निंग की मदद से उन्होंने साबित किया कि ये चिड़ियां इंसानों की तरह सोच-समझकर आपस में बातचीत करती हैं.
एली ने नर जेबरा फिंच पक्षियों की आवाज को सुना और रिकॉर्ड किया, और उन आवाजों को स्थिति और उन्हें निकालने वाले पक्षी के आधार पर कैटेगराइज किया. (फोटो क्रेडिट : Wolfgang Forstmeier)
नई दिल्ली: इंसानों और जानवरों के बीच सीधी बातचीत का रास्ता साफ हो गया है. कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी बर्कले की मशहूर साइंटिस्ट डॉ. जूली एली ने पक्षियों की भाषा को डिकोड कर लिया है. इस सफलता के लिए उन्हें 1 लाख डॉलर यानी करीब 94.4 लाख रुपये का प्रतिष्ठित कॉलर-डुलिटिल प्राइज दिया गया है. जूली ने जेब्रा फिंच नाम की चिड़िया की आवाज पर सालों तक रिसर्च की है. उन्होंने चिड़ियों के पूरे शब्दकोश को खोज निकाला है. अब यह साफ हो गया है कि चिड़िया सिर्फ आवाज नहीं करतीं बल्कि इंसानों की तरह पूरी बात कहती हैं. वे एक-दूसरे को अपना नाम बताती हैं और अपने काम की जानकारी भी शेयर करती हैं.
आखिर जूली एली ने चिड़ियों की गुप्त भाषा में क्या खोज निकाला है?
डॉ. जूली एली ने जेब्रा फिंच चिड़िया की बातचीत के 11 मुख्य शब्दों को डिकोड किया है. इन शब्दों से चिड़िया अपनी पहचान बताती हैं. वे बताती हैं कि वे इस वक्त क्या काम कर रही हैं. हर चिड़िया की अपनी एक अलग पहचान होती है. दूसरी चिड़िया आवाज सुनकर पहचान लेती हैं कि कौन बात कर रहा है. जूली ने पाया कि चिड़ियां केवल आवाज की नकल नहीं करतीं. उनके दिमाग में शब्दों का पूरा मतलब होता है. वे इंसानों की तरह सोचकर अपनी बात रखती हैं. कई बार वे मिलते-जुलते मतलब वाले शब्दों में कंफ्यूज भी हो जाती हैं. यह ठीक वैसा ही है जैसे इंसान बात करते समय गलती करते हैं.
मशीन लर्निंग तकनीक ने पक्षियों की डिक्शनरी बनाने में कैसे मदद की?
जूली ने इस प्रोजेक्ट पर पूरे 15 साल तक लगातार काम किया है. उन्होंने हजारों चिड़ियों की आवाज को रिकॉर्ड किया. इसके बाद उन्होंने मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का इस्तेमाल किया. इस एडवांस टेक्नोलॉजी ने आवाजों का बारीकी से एनालिसिस किया. जूली ने इसके बाद चिड़ियों पर कुछ खास टेस्ट भी किए. एक टेस्ट में चिड़ियों के सामने एक बटन रखा गया था. बटन दबाने पर उन्हें चिड़ियों की ही अलग-अलग आवाजें सुनाई देती थीं. कुछ खास आवाजों के बाद चिड़ियों को खाने के लिए बीज मिलते थे. चिड़ियों ने जल्द ही सीख लिया कि किन आवाजों पर खाना मिलता है. वे बिना काम की आवाजों को सोशल मीडिया वीडियो की तरह स्किप करने लगीं.
क्या साल 2030 तक इंसानों और जानवरों के बीच बातचीत शुरू हो जाएगी?
इस प्राइज को जेरेमी कॉलर फाउंडेशन और तेल अवीव यूनिवर्सिटी ने मिलकर शुरू किया है. इस फाउंडेशन ने जानवरों से बातचीत का कोड क्रैक करने पर 10 मिलियन डॉलर यानी करीब 94.4 करोड़ रुपये का महाप्राइज रखा है. जूली एली के अलावा कई और साइंटिस्ट भी इस रेस में शामिल हैं. एक फ्रेंच टीम ने चूहों की अल्ट्रासोनिक आवाजों को डिकोड किया है. वहीं एक दूसरी टीम ने बोनोबो बंदरों की भाषा पर काम किया है. ये बंदरों इंसानों की तरह वाक्यों को जोड़कर बोलते हैं. प्राइज के फाउंडर जेरेमी कॉलर ने कहा, ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है.’ उन्होंने भरोसा जताया कि साल 2030 तक इंसान और जानवर आपस में बात करने लगेंगे.
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दीपक वर्मा (Deepak Verma) की गिनती हिंदी डिजिटल मीडिया के तेजी से उभरते चेहरों में होती है. वह News18हिंदी के साथ डिप्टी न्यूज़ एडिटर की भूमिका में जुड़े हैं. प्रिंट से डिजिटल का रुख करने वाले दीपक के पास पत्र…और पढ़ें
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