सोनभद्र उत्तर प्रदेश की राजनीति में बढ़ी हलचल क्या बदल रहे हैं राजनीतिक समीकरण या सिर्फ सामाजिक सहभागिता प्राप्त जानकारी के अनुसार भगवान बिरसा मुंडा जी के कार्यक्रम में शामिल होने आए मंच पर मौजूदगी बनी चर्चा का विषय बिरसा मुंडा के शहादत दिवस पर आयोजित एक श्रद्धांजलि कार्यक्रम ने जिले के राजनीतिक गलियारों में नई बहस को जन्म दे दिया है। रामगढ़ क्षेत्र के सिल्थम पटना गांव में आयोजित कार्यक्रम में समाजवादी पार्टी के सक्रिय नेता एवं वरिष्ठ अधिवक्ता विकास शाक्य की मौजूदगी ने राजनीतिक जानकारों और आम लोगों का ध्यान अपनी ओर खींच लिया।कार्यक्रम का आयोजन अपना दल (एस) के विधि मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक चौबे की ओर से किया गया था। आयोजन का उद्देश्य भगवान बिरसा मुंडा को श्रद्धांजलि अर्पित करना था, लेकिन कार्यक्रम समाप्त होने के बाद सबसे अधिक चर्चा विकास शाक्य की मंचीय उपस्थिति को लेकर होने लगी।राजनीतिक गलियारों में सवाल उठने लगे कि क्या यह केवल एक सामाजिक कार्यक्रम में सहभागिता थी या फिर इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है। सोशल मीडिया से लेकर चाय की दुकानों तक लोगों के बीच इसी विषय पर चर्चाएं होती रहीं। समाजवादी पार्टी के युवा नेता अनुराग यादव ने इसे बदलते राजनीतिक रिश्तों का संकेत माना, जबकि समाजवादी पार्टी के ही विंढमगंज बूथ अध्यक्ष अक्षवर नाथ केसरी ने इसे महापुरुषों के सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में सामान्य उपस्थिति बताया।चर्चाओं के बीच विकास शाक्य ने खुद सामने आकर स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि भगवान बिरसा मुंडा जैसे महान जननायक किसी एक दल या विचारधारा तक सीमित नहीं हैं। उनके सम्मान में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होना सामाजिक दायित्व है और इसे राजनीतिक नजरिए से नहीं देखा जाना चाहिए।उन्होंने कहा कि महापुरुषों के विचार समाज को जोड़ने का काम करते हैं और ऐसे आयोजनों में उनकी उपस्थिति का उद्देश्य केवल श्रद्धांजलि अर्पित करना तथा युवाओं को उनके संघर्ष और बलिदान से परिचित कराना है।हालांकि राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चुनावी माहौल की आहट के बीच किसी भी दल के प्रमुख नेताओं का दूसरे दल के मंच पर दिखाई देना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन जाता है। यही वजह है कि विकास शाक्य की मौजूदगी को लेकर तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं।फिलहाल यह स्पष्ट है कि एक सामाजिक कार्यक्रम ने सोनभद्र की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। अब यह चर्चा कुछ दिनों में शांत हो जाती है या आने वाले समय में किसी बड़े राजनीतिक संकेत का रूप लेती है, इस पर सभी की निगाहें टिकी हुई हैं।











