
ओबरा/सोनभद्र।23 मार्च 2026 भारत के इतिहास का वह गौरवशाली और भावुक दिन, जब माँ भारती के तीन अनमोल रत्नों शहीद-ए-आजम भगत सिंह,राजगुरु और सुखदेव ने हंसते-हँसते फांसी के फंदे को चूम लिया था। उन्होंने अपना ‘आज’ हमारे ‘कल’ के लिए कुर्बान कर दिया ताकि आने वाली पीढ़ियां एक ऐसे भारत में सांस ले सकें जहाँ शोषण न हो, जहाँ हर हाथ को काम हो और हर बीमार को दवा मिले।लेकिन साथियों, आज स्वयं से एक प्रश्न पूछिए!क्या उन अमर क्रांतिकारियों ने ऐसे ‘ऊर्जा नगरी’ ओबरा का सपना देखा था? जहाँ आज मजदूरों का दमन हो रहा है: राष्ट्र निर्माण में लगे श्रमिकों से 12-12 घंटे का अमानवीय श्रम लिया जा रहा है। ठेकेदारों को किस दर पर कार्य आवंटित हुआ और मजदूरों को वास्तव में क्या मिल रहा है, इसका कोई हिसाब नहीं है।युवाओं का भविष्य राख हो रहा है: ओबरा ‘सी’ और आगामी परियोजनाओं के बावजूद यहाँ के स्थानीय युवाओं को रोजगार के लिए दरकिनार कर बाहरी लोगों को नवाजा जा रहा है।बुनियादी सुविधाएं वेंटिलेटर पर हैं:प्रदूषण से सांसें घुट रही हैं, अस्पताल खुद बीमार है, पैसेंजर ट्रेनें बंद हैं और हमारे सरकारी स्कूलों को निजीकरण की भेंट चढ़ाया जा रहा है।यह स्थिति उन शहीदों के बलिदान का अपमान है।प्रशासन की उदासीनता और ठेकेदारों की मनमानी ने ओबरा को ‘बंधुआ मजदूरी’ का केंद्र बना दिया है। यदि आज हम चुप रहे, तो इतिहास हमें कभी माफ नहीं करेगा। 23 मार्च की यह तिथि हमें याद दिलाती है कि आज़ादी और अधिकार मांगने से नहीं, लड़कर लिए जाते हैं।हमारी स्पष्ट और न्यायोचित मांगें:समस्त परियोजनाओं में 8 घंटे की कार्य-अवधि और ओवरटाइम का पारदर्शी भुगतान सुनिश्चित हो।ठेका आवंटन की दरें और मजदूरों को मिलने वाली सुविधाओं का पूर्ण विवरण सूचना बोर्ड पर सार्वजनिक किया जाए।ओबरा के स्थानीय युवाओं को रोजगार में 70% प्राथमिकता मिले।अस्पताल का सुदृढ़ीकरण,प्रदूषण नियंत्रण और बंद पड़ी ट्रेनों का संचालन तुरंत शुरू हो।सरकारी संस्थानों के निजीकरण पर रोक लगे और ‘प्रशासन-नागरिक संयुक्त निगरानी समिति’ का गठन हो।मेरा आह्वान:ओबरा के स्वाभिमानी जनमानस! कल अपने घरों से बाहर निकलिए। यह लड़ाई किसी व्यक्ति की नहीं,ओबरा के अस्तित्व की है।आइए, शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि उनके सपनों के ओबरा को बचाकर दें।

