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जन आंदोलन से उपजे ₹4.93 करोड़ के बजट पर PWD का ‘सतरंगी खेल

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Published On: June 20, 2026

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  • धूल के बवंडर और कीचड़ के टापू में घुट रही ओबरा-डाला की त्रस्त जनता
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सोनभद्र/वाराणसी।शक्तिनगर मार्ग (SH-5) डाला से बिल्ली गजराज नगर संपर्क मार्ग की जमीनी हकीकत आज लोक निर्माण विभाग (PWD) की लापरवाही का सबसे बड़ा सबूत बन चुकी है। सरकार ने ₹4 करोड़ 93 लाख की यह भारी-भरकम रकम इसलिए मंजूर की थी ताकि जनता को एक आसान, सुरक्षित और बेहतर सफर का अधिकार मिल सके। लेकिन ओबरा क्षेत्र में एक लंबे समय से कुर्सी पर पैर जमाए बैठे जूनियर इंजीनियर (जेई) जितेंद्र सिंह और उनके पसंदीदा ठेकेदार की मनमानी का आलम यह है कि दोनों ने मिलकर इस पूरे ₹4.93 करोड़ के प्रोजेक्ट को एक मज़ाक बनाकर रख दिया है। हैरानी की बात यह है कि स्थानीय स्तर पर लगातार सबूतों के साथ खबरें छपने और जनता द्वारा अनगिनत गंभीर शिकायतें किए जाने के बावजूद बड़े अधिकारियों की आँखें नहीं खुल रही हैं। क्या बड़े साहबों की यह चुप्पी सीधे तौर पर इन लापरवाह लोगों की हिम्मत को सातवें आसमान पर पहुँचाने का एक सोचा-समझा तरीका है?विभाग के इस अनोखे काम और तकनीकी नियमों को ताक पर रखने का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि निर्माण कार्य में ‘नियम और कानून’ जैसी चीजें पूरी तरह से गायब हैं। विभाग का तरीका देखिए-पहले नाली का काम थोड़ा सा आगे बढ़ाएंगे, फिर उसे वैसे ही आधा-अधूरा छोड़कर आगे भाग जाएंगे। फिर सड़क किनारे इंटरलॉकिंग के लिए गिट्टी-कंक्रीट डालेंगे, उसे भी बीच में छोड़कर कहीं और चले जाएंगे। सड़क का चौड़ीकरण तो और भी नायाब है; नियम-कानून को ताक पर रखकर, घर और व्यक्ति विशेष के रसूख और जान-पहचान को देखकर एक तरफ की चौड़ाई बहुत ज्यादा बढ़ा दी गई है, जबकि दूसरी तरफ सड़क को दबाकर छोड़ दिया गया है। इस वीआईपी लापरवाही का नतीजा यह है कि इस पूरे मार्ग पर जगह-जगह टूटे, उबड़-खाबड़ रास्तों और मलबे का ऐसा जाल बिछ गया है, जिसके कारण जून 2026 की इस भीषण गर्मी में भी पूरा क्षेत्र धूल के घने और दमघोंटू कोहरे से ढका रहता है।इस बदहाली का दर्द वो वीआईपी अधिकारी क्या समझेंगे, जो बंद गाड़ियों में घूमते हैं! असली मुसीबत तो उस गरीब और मध्यमवर्गीय समाज की है जो बाइक, ई-रिक्शा, टोटो, टेम्पो या पैदल इस नरक से गुजरने को मजबूर है। जब एक आम नागरिक घर से साफ-सुथरा, नहा-धोकर और अच्छे कपड़े पहनकर निकलता है, तो इस प्रदूषित माहौल में कदम रखते ही कुछ ही दूरी पर उसका पूरा शरीर और कपड़े धूल से सन जाते हैं। स्थानीय निवासियों के लिए यह धूल का बवंडर सीधे उनके फेफड़ों और आँखों पर वार कर रहा है, जिससे लोग गंभीर बीमारियों का शिकार हो रहे हैं। हद तो तब हो जाती है जब धूल से घबराकर लोग बारिश की उम्मीद करते हैं, और हल्की सी फुहार पड़ते ही यह आधा-अधूरा छूटा हुआ काम और सड़क पर बिखरा मलबा कीचड़ के जानलेवा दलदल और जलभराव के टापू में बदल जाता है। गाड़ियाँ आधे से ज्यादा पानी में डूब जाती हैं, जिससे मोटरसाइकिल और टोटो का पलटना और राहगीरों का चोटिल होकर अस्पताल पहुँचना एक आम बात बन चुकी है। जनता के बहते खून और लगातार हो रही इन दुर्घटनाओं के बाद भी जनसुनवाई (IGRS) पोर्टल पर शिकायतों के समाधान के नाम पर दफ्तर में बैठकर केवल झूठी रिपोर्ट लगा दी जाती है, जबकि धरातल पर काम पूरी तरह शून्य है।

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