—Advertisement—

Iran US War Ceasefire Reason, Trump Munir Phone Call | ट्रंप ने आधी रात दो फोन कॉल्स किए, एक मुनीर को मगर दूसरा किसको? ईरान सीजफायर की इनसाइड स्टोरी

Author Picture
Published On: April 8, 2026

—Advertisement—

Last Updated:

Iran War Ceasefire Reason: अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम कराने के लिए पाकिस्तान ने ‘फ्लैटरी डिप्लोमेसी’ अपनाई. उसने रिश्तों, पहुंच और चापलूसी का ऐसा मिश्रण तैयार किया, जो इस जंग के एक्टर्स (अमेरिका और ईरान) पर काम कर गया. कूटनीतिक का यह मॉडल कितना टिकाऊ है, यह आने वाला समय बताएगा. फिलहाल पाकिस्तान ने यह साबित किया है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में चापलूसी, चालाकी और टाइमिंग बहुत मायने रखती है.

Zoom

न्यूयॉर्क टाइम्स के अनुसार, ट्रंप ने सीजफायर की घोषणा से पहले दो फोन कॉल किए थे. (Photo : The White House/File)

नई दिल्ली: अमेरिका और इजरायल की ईरान के साथ जंग बुधवार तड़के अचानक रुक गई. ईरान और अमेरिका, दोनों ही अब अपनी-अपनी जीत का दावा कर रहे हैं. इस जंग ने दुनिया के हर कोने को प्रभावित किया था. पाकिस्तान ने इस संघर्ष में शांतिदूत की भूमिका निभाकर सबको हैरान कर दिया है. इस समझौते ने छह हफ्ते से जारी उस लड़ाई पर लगाम लगा दी है, जिसने 12 देशों में तबाही मचाई थी. ईरान में ही 1,600 से ज्यादा नागरिक मारे जा चुके हैं. दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी थी जहां से वापसी मुमकिन नहीं लग रही थी, लेकिन पाकिस्तान ने ‘ऑफ-रैंप’ तैयार कर दिया.

युद्ध के बीच अचानक युद्धविराम कैसे हुआ?

अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच बढ़ती टकराहट ने दुनिया को बड़े युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया था. करीब छह हफ्तों तक चले संघर्ष में हजारों लोग मारे गए. ईरान में सैकड़ों नागरिकों की जान गई. तेल बाजार हिल गया. वैश्विक सप्लाई चेन पर असर पड़ा. इसी तनाव के बीच अचानक युद्धविराम की घोषणा हुई. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सबसे पहले इसकी जानकारी दी. कुछ ही देर बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने इसकी पुष्टि कर दी. इस घोषणा के साथ पाकिस्तान ने खुद को उस देश के रूप में पेश किया, जिसने दोनों दुश्मनों को बातचीत की टेबल तक लाने में मदद की.

‘इस्लामाबाद टॉक्स’ का प्रस्ताव और पाकिस्तान की भूमिका

पाकिस्तान ने युद्धविराम के बाद अगला बड़ा दांव खेला. उसने स्थायी शांति वार्ता के लिए ‘इस्लामाबाद टॉक्स’ का प्रस्ताव दिया. इसका मतलब साफ था. पाकिस्तान सिर्फ मध्यस्थ नहीं रहना चाहता, बल्कि वह खुद को इस डिप्लोमेसी का केंद्र बनाना चाहता है. विशेषज्ञों के अनुसार, यह पाकिस्तान के लिए एक बड़ा अवसर था. इससे वह अंतरराष्ट्रीय मंच पर अपनी साख सुधार सकता है, जो पिछले कुछ वर्षों में कमजोर हुई थी.

Related News
Home
Facebook
Telegram
X