बीकानेर. राजस्थान के बीकानेर जिले का छोटा सा ढींगसरी गांव आज अपनी फुटबॉल प्रतिभा के कारण “मिनी ब्राजील” के नाम से देशभर में पहचान बना रहा है. कभी जहां दूर-दूर तक रेत के टिब्बे और बंजर जमीन नजर आती थी, वहीं अब हरे-भरे फुटबॉल मैदान गांव की नई पहचान बन चुके हैं. इन मैदानों पर सुबह-शाम बालक और बालिकाएं फुटबॉल की प्रैक्टिस करते दिखाई देते हैं. ढींगसरी गांव की सबसे बड़ी खासियत यहां की बेटियां हैं, जिन्होंने खेल के दम पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई है.
बदलाव के पीछे छिपा है कोच विक्रम सिंह राजवी का संघर्ष
बीकानेर से करीब 75 किलोमीटर दूर ढींगसरी गांव की इस बदलाव भरी कहानी के पीछे कोच विक्रम सिंह राजवी का संघर्ष और सपना छिपा है. वर्ष 2021 में उन्होंने गांव में बालिकाओं के लिए फुटबॉल प्रशिक्षण शुरू किया. शुरुआत आसान नहीं थी. ग्रामीण परिवेश और रूढ़िवादी सोच के कारण परिवार अपनी बेटियों को मैदान तक भेजने से हिचकिचाते थे, लेकिन विक्रम सिंह ने हार नहीं मानी. वे घर-घर जाकर अभिभावकों को समझाया और बेटियों को खेल में आगे बढ़ने का मौका देने की अपील की. धीरे-धीरे बालिकाएं मैदान तक पहुंचने लगीं और फिर यह कारवां लगातार बढ़ता चला गया.
कई देशों में जोहर दिखा चुकीं है ढींगसरी गांव की बटियां
खुद फुटबॉल खिलाड़ी रह चुके हैं विक्रम सिंह राजवी
विक्रम सिंह राजवी खुद फुटबॉल खिलाड़ी रहे हैं. उनका सपना था कि गांव की बेटियों को भी वही मंच मिले, जो बड़े शहरों के खिलाड़ियों को मिलता है. इसी सोच के साथ उन्होंने अपनी जमीन बेचकर गांव के अंदर करीब आठ बीघा जमीन खरीदी और फुटबॉल मैदान तैयार किया. बाद में दो बीघा जमीन एक भामाशाह ने दान में दी. आज यहां तीन घास के मैदान, दो फुटबॉल मैदान, हॉस्टल, डाइट और खेल की आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध हैं.
अकादमी में 130 लड़कियां नियमित ले रही हैं प्रशिक्षण
अकादमी में बालिकाओं को सभी सुविधाएं नि:शुल्क दी जा रही हैं. यहां बने हॉस्टल में करीब 40 बालिकाएं रह सकती हैं. दिन में ये बच्चियां सरकारी स्कूल में पढ़ाई करती हैं और शाम को मैदान में घंटों अभ्यास करती हैं. वर्तमान में यहां करीब 130 बालिकाएं नियमित प्रशिक्षण ले रही हैं. इन खिलाड़ियों की सबसे खास बात यह है कि अधिकांश बच्चियां गरीब किसान और पशुपालक परिवारों से आती हैं. कई खिलाड़ियों के पिता बकरी पालन कर परिवार चलाते हैं. ऐसे परिवारों में बेटियों को खेल के लिए आगे भेजना आसान नहीं था, लेकिन अब हालात बदल चुके हैं. आज गांव के लोग खुद अपनी बेटियों को फुटबॉल खेलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं.
2024 में ढींगसरी गांव की बेटियों ने रचा था इतिहास












