गांव-देहात के लोग या आदिवासी लोग आज भी नहीं जानते कि आर्किटेक्चर क्या होता है, घर की डिजाइनिंग कैसे की जाती है पर अपने सामान्य ज्ञान और खुद के विज्ञान से वे ऐसे घर तैयार करते हैं जो शहरी घरों से कहीं अधिक ठंडे रहते हैं. आजकल की तपिश में जब कूलर-पंखे में भी चैन नहीं पड़ता, ऐसे में भी झारखंड के ये खास तकनीक और सामान से बने घर, अंदर से ठंडे रहते हैं. बाहर के तापमान से घर के अंदर का तापमान 4-5 डिग्री तक कम होता है. ये सीमेंट, मौंरग, जैसा सामान नहीं बल्कि लाल ईंट, मिट्टी, गोबर, पुआल, टाली जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल करते हैं. इनका घर बनाने का यह खास तरीका आज भी शहर के आर्किटेक्चर को चैलेंज करता है.
गांव-देहात के लोग या आदिवासी लोग आज भी नहीं जानते कि आर्किटेक्चर क्या होता है, घर की डिजाइनिंग कैसे की जाती है पर अपने सामान्य ज्ञान और खुद के विज्ञान से वे ऐसे घर तैयार करते हैं जो शहरी घरों से कहीं अधिक ठंडे रहते हैं. आजकल की तपिश में जब कूलर-पंखे में भी चैन नहीं पड़ता, ऐसे में भी झारखंड के ये खास तकनीक और सामान से बने घर, अंदर से ठंडे रहते हैं. बाहर के तापमान से घर के अंदर का तापमान 4-5 डिग्री तक कम होता है. ये सीमेंट, मौंरग, जैसा सामान नहीं बल्कि लाल ईंट, मिट्टी, गोबर, पुआल, टाली जैसी सामग्रियों का इस्तेमाल करते हैं. इनका घर बनाने का यह खास तरीका आज भी शहर के आर्किटेक्चर को चैलेंज करता है.













