- बड़गांव स्वास्थ्य केंद्र पर शासन-प्रशासन की आपराधिक चुप्पी!






सोनभद्र /चोपन।जनपद सोनभद्र के चोपन विकासखंड स्थित बड़गांव का स्वास्थ्य केंद्र आज केवल एक इमारत नहीं, बल्कि प्रशासनिक तंत्र की उस ‘गहरी सड़न’ का प्रमाण है, जिसे पिछले चार वर्षों से जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है। अस्पताल के प्रवेश द्वार पर टंगा ‘गुड सेमेरिटन’ (नेक आदमी) का बोर्ड उन राहगीरों और ग्रामीणों के लिए एक क्रूर मजाक की तरह है, जो यहां उम्मीद लेकर आते हैं। जिस स्थान पर दुर्घटना पीड़ितों को जीवनदान मिलना चाहिए था, वहां आज चारों तरफ फैली गंदगी, शराब की बोतलें और खंडहर में तब्दील हो चुका बुनियादी ढांचा इस बात की गवाही दे रहा है कि यहां ‘स्वास्थ्य सेवा’ का अधिकार नहीं, बल्कि सरकारी धन की बर्बादी का खेल खेला जा रहा है। हैरान करने वाली बात यह है कि इस केंद्र के लिए सरकार ने न केवल करोड़ों की इमारत खड़ी की, बल्कि आवासीय कैंपस तक बनाए, लेकिन आज वहां तैनात डॉक्टर अपनी सुविधा के अनुसार सुबह 10 बजे आकर महज 12 बजे तक ‘हाजिरी’ बजाकर लौट जाते हैं। क्या यह केवल डॉक्टरों की लापरवाही है? नहीं, यह उस पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की मिलीभगत है, जिसके तहत बड़गांव जैसे संवेदनशील और आदिवासी बहुल क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवा को ‘ब्रेन-डेड’ कर दिया गया है।
अस्पताल में भ्रष्टाचार की परतें इतनी गहरी हैं कि वहां के सफाई कर्मचारी के पद पर नियुक्ति से लेकर कार्यप्रणाली तक, सब कुछ संदेह के घेरे में है। सरकारी खजाने से 51,000 रुपये का मासिक वेतन पाने वाले इस पद पर जिस तरह से धरातल पर काम हो रहा है, वह बताता है कि कैसे अनुकंपा और नियुक्ति के नाम पर सरकारी योजनाओं का दोहन किया जा रहा है। स्थानीय ग्रामीणों की पीड़ा यह है कि उन्होंने दर्जनों बार शिकायतें कीं, सांसद-विधायक से लेकर जिलाधिकारी तक अपनी बात पहुंचाई, लेकिन नतीजा वही ‘शून्य’ निकला। क्या यह मान लेना उचित है कि सोनभद्र का गरीब आदिवासी परिवार इलाज के लिए अपना हक़ खो चुका है? यह अस्पताल जो कभी क्षेत्र के दर्जनों गांवों की लाइफ-लाइन हुआ करता था, आज निजी अस्पतालों के मुनाफे के लिए बलि चढ़ाया जा रहा है। प्रशासन के अधिकारी जो जिला मुख्यालय में एयर-कंडीशंड कमरों में बैठकर ‘सब चंगा है’ की रिपोर्ट तैयार करते हैं, उन्हें बड़गांव की उन टूटी हुई खिड़कियों और धूल फांकते बेड के पीछे का वह ‘सरकारी अपराध’ दिखाई नहीं देता, जो हर दिन किसी न किसी की जान ले रहा है।
अब समय आ गया है कि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक जी इस मामले का व्यक्तिगत संज्ञान लें। हम मात्र एक जांच कमेटी की मांग नहीं कर रहे, बल्कि उस प्रशासनिक आतंकवाद की जड़ को उखाड़ने की मांग कर रहे हैं जिसने बड़गांव स्वास्थ्य केंद्र को नशेडियों का अड्डा और भ्रष्टाचार का केंद्र बना दिया है। यदि 24 घंटे के भीतर इस अस्पताल का कायाकल्प नहीं हुआ, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि सोनभद्र के आदिवासियों के स्वास्थ्य का अधिकार केवल फाइलों की शोभा बढ़ाने के लिए है। यह लेख एक चेतावनी है-या तो व्यवस्था सुधारे, अन्यथा जनता की यह गूंज, जिसे प्रशासन नजरअंदाज कर रहा है, जल्द ही सड़क पर उतरकर न्याय की मांग करेगी।











