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स्क्वैश खिलाड़ी करने लगा मॉडलिंग, एक्टिंग में हाथ आजमाने के बाद बने फिल्ममेकर, जीता नेशनल अवॉर्ड

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Published On: April 6, 2026

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संजय सूरी का जीवन कश्मीर के स्ट्रगल से लेकर बॉलीवुड में अपनी पहचान बनाने तक की एक इंस्पिरेशनल जर्नी है. बचपन में आतंकवाद के कारण पिता को खोने के बाद वे दिल्ली आए और स्क्वैश खिलाड़ी से मॉडल व अभिनेता बने. उन्होंने ‘झंकार बीट्स’ और ‘माई ब्रदर… निखिल’ जैसी लीक से हटकर फिल्मों में काम किया, जिसने एचआईवी और एलजीबीटीक्यू जैसे संवेदनशील मुद्दों पर समाज में बहस छेड़ी. हालांकि, बतौर अभिनेता उन्हें वह स्टारडम नहीं मिला, लेकिन निर्माता के रूप में उनकी फिल्म ‘आई एम’ ने नेशनल अवॉर्ड जीता. आज वे ओटीटी और अपने प्रोडक्शन हाउस के जरिए एक्टिव हैं.

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संजय सूरी ने बचपन में आतंकवाद के कारण पिता को खो दिया था.

नई दिल्ली: संजय सूरी की कहानी किसी फिल्मी स्क्रिप्ट से कम नहीं है, जो कश्मीर की वादियों से शुरू होकर स्ट्रगल और सफलता के एक अलग मुकाम तक पहुंचती है. 6 अप्रैल को अपना 55वां जन्मदिन मना रहे संजय ने बचपन में वो दर्द झेला है जो किसी को भी तोड़ सकता है. एक कश्मीरी पंडित परिवार में जन्मे संजय ने बेहद छोटी उम्र में अपने पिता को आतंकवाद के कारण खो दिया था, जिसके बाद उनके परिवार को अपनी जड़ें छोड़कर दिल्ली शिफ्ट होना पड़ा. मजेदार बात यह है कि आज एक मंझे हुए एक्टर और निर्माता के रूप में पहचाने जाने वाले संजय कभी स्पोर्ट्स में अपना भविष्य देखते थे. मॉडलिंग में आने से पहले वह एक प्रोफेशनल स्क्वैश खिलाड़ी थे, लेकिन किस्मत उन्हें विज्ञापन की दुनिया में ले आई. रिया सेन के साथ उनके निरमा साबुन के विज्ञापन ने उन्हें रातों-रात घर-घर में पहचान दिला दी और यहीं से उनके लिए बॉलीवुड के दरवाजे खुल गए.

संजय सूरी ने अपने फिल्मी करियर की शुरुआत ‘प्यार में कभी-कभी’ से की थी, जो बॉक्स ऑफिस पर तो खास कमाल नहीं दिखा पाई, लेकिन इसने उन्हें इंडस्ट्री में पैर जमाने का मौका दे दिया. उन्होंने ‘पिंजर’, ‘दामन’ और ‘दिल विल प्यार व्यार’ जैसी फिल्मों में सपोर्टिंग रोल निभाए, पर उन्हें असली पहचान 2003 की फिल्म ‘झंकार बीट्स’ से मिली. संजय की सबसे बड़ी खासियत यह रही कि उन्होंने उन किरदारों को चुनने की हिम्मत दिखाई जिनसे दूसरे बड़े सितारे कतराते थे. इसका सबसे बड़ा उदाहरण 2005 में आई फिल्म ‘माई ब्रदर… निखिल’ है. उस दौर में जब समाज में एचआईवी और एलजीबीटीक्यू (LGBTQ) जैसे विषयों पर बात करना भी वर्जित माना जाता था, संजय ने एक एचआईवी पॉजिटिव समलैंगिक शख्स का किरदार निभाकर सबको चौंका दिया. इस फिल्म ने न सिर्फ समाज में एक नई बहस छेड़ी, बल्कि संजीदा अभिनय के मामले में संजय का कद बहुत ऊंचा कर दिया.

ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी काफी एक्टिव
संजय सूरी को बेहतरीन अभिनय और साहसी चुनाव के बावजूद बतौर एक्टर स्टारडम नहीं मिला, जिसके वह हकदार थे. लेकिन उन्होंने हार मानने के बजाय खुद को एक सफल निर्माता के रूप में स्थापित किया. उनके प्रोडक्शन हाउस ‘एंटीक्लॉक फिल्म्स’ के बैनर तले बनी फिल्म ‘आई एम’ को बेस्ट फीचर फिल्म का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला, जो उनके विजन और मेहनत का सबसे बड़ा प्रमाण है. आज संजय न केवल फिल्मों बल्कि ओटीटी प्लेटफॉर्म्स पर भी काफी सक्रिय हैं और ‘चौरंगा’ जैसी सार्थक फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं. कश्मीर के संघर्ष से निकलकर नेशनल अवॉर्ड जीतने तक का उनका यह सफर दिखाता है कि अगर संकल्प मजबूत हो, तो इंसान अपनी किस्मत खुद लिख सकता है.

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Abhishek Nagar

अभिषेक नागर News 18 Digital में Senior Sub Editor के पद पर काम कर रहे हैं. वे News 18 Digital की एंटरटेनमेंट टीम का हिस्सा हैं. वे बीते 6 सालों से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं. वे News 18 Digital से पहल…और पढ़ें

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