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वियतनाम की वो जंग: जब ताबूतों के बोझ से ढह गया अमेर‍िका का गुरूर, बर्बाद हो गए राष्‍ट्रपत‍ि, ईरान दोहराएगा?

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Published On: March 31, 2026

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ईरान युद्ध का नतीजा क्‍या वियतनाम जंग की तरह होगा? यह सवाल इसल‍िए क्‍योंक‍ि दोनों युद्धों में काफी कुछ समानता नजर आ रही है. तब शक्‍त‍िशाली राष्‍ट्रपत‍ि जॉनसन फंसे थे, आज डोनाल्‍ड ट्रंप फंसे नजर आ रहे हैं. जनता का व‍िद्रोह बढ़ता जा रहा है, पॉपुलैर‍िटी रेट‍िंग -17 तक पहुंच गई है. और न‍िकलने का कोई रास्‍ता नजर नहीं आ रहा है.

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वियतनाम वॉर ने तब के राष्‍ट्रपत‍ि जॉनसन की कुर्सी ले ली. (Reuters)

इतिहास के पन्नों में कुछ युद्ध ऐसे छपे हैं, जो केवल सीमाओं पर नहीं, बल्कि सत्ता के गलियारों में लड़े और हारे गए. अमेरिका के लिए वियतनाम युद्ध एक ऐसा ही खूनी दलदल साबित हुआ, जिसने न केवल दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति के अजेय होने भ्रम तोड़ा, बल्कि व्हाइट हाउस में बैठे सबसे शक्तिशाली शख्स राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन के राजनीतिक वजूद को मिट्टी में मिला दिया. आज ईरान में जो कुछ हो रहा है, तो वियतनाम की वो तस्वीरें फिर से जेहन में कौंध रही हैं, जब समंदर पार से तिरंगे में लिपटे अमेरिकी सैनिकों के शवों ने अमेरिका की पूरी पॉल‍िट‍िक्‍स बदल दी थी.

वियतनाम युद्ध में अमेर‍िका ने वो नंगा नाच क‍िया, ज‍िसकी कल्‍पना दुन‍िया ने कभी नहीं की. लेकिन जब दक्षिण वियतनाम के जंगलों से अमेरिकी सैनिकों के शव ताबूतों में लिपटकर वाशिंगटन और कैलिफोर्निया पहुंचने लगे, तो अमेरिका के भीतर एक ऐसा ज्वालामुखी फटा जिसने तत्कालीन राष्ट्रपति लिंडन बी. जॉनसन के राजनीतिक करियर को राख कर दिया.

वीडियो से लिए गए इस स्क्रीनशॉट में 24 फरवरी, 1969 को दक्षिण वियतनाम के लॉन्ग बिन्ह में अमेरिकी सैनिक जंगल में प्रवेश करते हुए दिखाई दे रहे हैं। (रॉयटर्स टीवी के माध्यम से)
  1. अमेरिका के इतिहास का यह पहला युद्ध था जिसे लोगों ने अपने टीवी सेट पर देखा. शाम के वक्त जब अमेरिकी परिवार खाने की मेज पर बैठते, तो टीवी स्क्रीन पर वियतनाम के जंगलों में जलते हुए गांव और हेलिकॉप्टरों से लटकते अमेरिकी सैनिकों के शव दिखाई देते.
  2. 1960 के दशक आख‍िरी वर्षों तक हर हफ्ते सैकड़ों अमेरिकी जवान ताबूतों में लौट रहे थे. इन ‘बॉडी बैग्स’ ने अमेरिकी जनता के भीतर उस गुस्से को जन्म दिया, जिसने शांति के नारों को विद्रोह में बदल दिया. आज ईरान को लेकर अमेर‍िका में कुछ इसी तरह का विद्रोह पनप रहा है.
  3. तब राष्ट्रपति जॉनसन और पेंटागन लगातार दावा कर रहे थे कि वे युद्ध जीत रहे हैं, लेकिन जब जमीन पर सैनिकों की लाशों का अंबार लगने लगा, तो जनता को समझ आ गया कि व्हाइट हाउस उनसे झूठ बोल रहा है. इसी भरोसे के टूटने को इतिहास में क्रेडिबिलिटी गैप कहा गया. आज ईरान पर भी कुछ इसी तरह सवाल उठ रहे हैं.
साउथ व‍ियतनाम में जंग के दौरान हेलीकॉप्‍टर का इंतजार करते यूएस मरीन कमांडो. (File Photo-Reuters)

लिंडन बी जॉनसन की स‍ियासत का अंत

लिंडन बी. जॉनसन एक ऐसे राष्ट्रपति थे जिन्होंने अमेरिका से गरीबी मिटाने और स‍िव‍िल राइट्स को लागू करने का सपना देखा था. लेकिन वियतनाम के भूत ने उनके हर सपने को निगल लिया. जॉनसन ने एक ऐसी जंग में 5 लाख से ज्यादा सैनिक झोंक दिए, जिसे न तो वे जीत पा रहे थे और न ही सम्मानजनक तरीके से छोड़ पा रहे थे.

1968 की शुरुआत तक जॉनसन इतने अलोकप्रिय हो चुके थे कि उनके अपने ही दल के लोग उनके खिलाफ खड़े हो गए. छात्रों के प्रदर्शनों ने व्हाइट हाउस को घेर लिया. अंततः, 31 मार्च 1968 को एक थके हुए और टूटे हुए राष्ट्रपति ने टीवी पर ऐलान किया- मैं अगले कार्यकाल के लिए नामांकन स्वीकार नहीं करूंगा. एक युद्ध ने एक शक्तिशाली नेता का करियर हमेशा के लिए दफन कर दिया. आज अमेर‍िकी राष्‍ट्रपत‍ि डोनाल्‍ड ट्रंप की -17 रेटिंग कुछ कुछ उसी की कॉपी लगती है.

ईरान संकट और वियतनाम की परछाई

अमेरिका ने वियतनाम से सीखा कि आप बमों से जमीन तो जीत सकते हैं, लेकिन उस जमीन पर रहने वाले लोगों का संकल्प नहीं. आज ईरान के साथ किसी भी सीधे टकराव में अमेरिका को वही ‘बॉडी बैग्स’ का डर सताता है, जिसने कभी जॉनसन की सत्ता छीन ली थी.  इजरायल-ईरान के बीच जारी तनाव में अमेरिका की झिझक के पीछे वही ‘वियतनाम सिंड्रोम’ है. उसे पता है कि मध्य-पूर्व का रेगिस्तान भी वियतनाम के दलदली जंगलों की तरह विनाशकारी साबित हो सकता है.

तब सरकार के ख‍िलाफ लोग सड़कों पर उतर आए थे, आज भी अमेर‍िका में वैसा ही नजारा दिख रहा.

10 सबक, जो अमेर‍िका नहीं भूला होगा

  1. ‘बूट्स ऑन द ग्राउंड’ की सीमा: अमेरिका को समझ आया कि केवल भारी संख्या में सैनिक भेजने से युद्ध नहीं जीता जा सकता. वियतनाम के घने जंगलों में तकनीक और संख्या धरी रह गई. यही वजह है क‍ि आज भी ईरान में सेना उतारने से पहले अमेर‍िका 100 बार सोच रहा है.
  2. लोकल सपोर्ट: अमेर‍िका को पता चल गया क‍ि सैन्य ताकत से जमीन जीती जा सकती है, लेकिन लोगों का दिल नहीं. अमेरिका वियतनाम के लोगों को यह विश्वास दिलाने में नाकाम रहा कि वह उनके भले के लिए वहां है. बिना स्थानीय आबादी के समर्थन के कोई भी विदेशी सेना लंबे समय तक किसी दूसरे देश में टिक नहीं सकती. ईरान में यह सबक भी काम आएगा.
  3. गुर‍िल्‍ला युद्ध का खतरा: वियतकांग लड़ाकों ने पारंपरिक युद्ध के बजाय ‘हिट एंड रन’ रणनीति अपनाई. अमेरिका की विशाल सेना को समझ आया कि एक अदृश्य दुश्मन, जो अपनी जमीन के चप्पे-चप्पे को जानता हो, उसे हराना लगभग असंभव है. यह सबक आज भी तालिबान या हिज़्बुल्ला जैसे समूहों के खिलाफ लड़ाई में दिखता है.
  4. क्रेडिबिलिटी गैप : सरकार और जनता के बीच का भरोसा टूटना हार की पहली सीढ़ी है. लिंडन बी. जॉनसन की सरकार ने युद्ध की प्रगति को लेकर झूठ बोला, जिसका खुलासा ‘पेंटागन पेपर्स’ ने किया. इसके बाद अमेरिकी जनता का अपनी ही सरकार और सेना के दावों पर से हमेशा के लिए विश्वास कम हो गया.
  5. मीडिया की ताकत और बढ़ी: वियतनाम पहला युद्ध था जो टीवी पर प्रसारित हुआ. जलते गांव और सैनिकों के शवों ने घर बैठे अमेरिकियों को विचलित कर दिया. अमेरिका ने सीखा कि युद्ध केवल मोर्चे पर नहीं, बल्कि सूचना और नैरेटिव के स्तर पर भी लड़ा और जीता या हारा जाता है. ईरान युद्ध में यह खतरा कहीं ज्‍यादा बड़ा है.
  6. वार पावर्स एक्ट : राष्ट्रपति की असीमित शक्तियों पर लगाम लगाने के लिए 1973 में ‘वार पावर्स एक्ट’ लाया गया. अब अमेरिकी राष्ट्रपति संसद की अनुमति के बिना लंबे समय तक युद्ध नहीं खींच सकता. यह सबक जॉनसन और निक्सन द्वारा बिना ठोस योजना के युद्ध विस्तार करने के कारण लिया गया था.
  7. ‘वियतनाम सिंड्रोम’ और विदेश नीति: इस हार ने अमेरिका के भीतर एक डर पैदा किया, जिसे ‘वियतनाम सिंड्रोम’ कहा गया. इसके बाद अमेरिका दशकों तक किसी भी बड़े संघर्ष में सीधे कूदने से बचता रहा। अब वह सीधे लड़ने के बजाय मित्र देशों को हथियार और ट्रेनिंग देकर ‘प्रॉक्सी वॉर’ को तरजीह देता है.
  8. जबरन भर्ती का अंत : वियतनाम के दौरान युवाओं को जबरन सेना में भर्ती किया गया, जिससे देशव्यापी विरोध हुआ. इसके बाद अमेरिका ने ‘ऑल-वॉलंटियर फोर्स’ मॉडल अपनाया. अब अमेरिकी सेना में केवल वही पेशेवर सैनिक होते हैं जो स्वेच्छा से भर्ती होते हैं, जिससे समाज में युद्ध के प्रति सीधा आक्रोश कम रहता है.
  9. एग्जिट स्ट्रैटेजी की जरूरत: युद्ध शुरू करना आसान है, लेकिन बाहर निकलना सबसे कठिन. अमेरिका के पास वियतनाम से निकलने की कोई स्पष्ट योजना नहीं थी. आज पेंटागन की किसी भी सैन्य योजना में ‘जीत’ के साथ-साथ ‘वापसी’ का रास्ता पहले से तय करना अनिवार्य सबक बन चुका है.
  10. सुपरपावर की सीमाओं का एहसास: वियतनाम ने अमेरिका का यह भ्रम तोड़ दिया कि वह दुनिया का ‘थानेदार’ बनकर हर समस्या का समाधान सैन्य बल से कर सकता है. उसे समझ आया कि एक छोटी लेकिन संकल्पित ताकत भी दुनिया की सबसे बड़ी महाशक्ति को धूल चटा सकती है और उसे पीछे हटने पर मजबूर कर सकती है. ईरान ने यह भ्रम और दूर कर द‍िया.

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Gyanendra Mishra

Mr. Gyanendra Kumar Mishra is associated with hindi.news18.com. working on home page. He has 20 yrs of rich experience in journalism. He Started his career with Amar Ujala then worked for ‘Hindustan Times Group…और पढ़ें

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