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बॉलीवुड की मशहूर एक्ट्रेस मीना कुमारी की आज डेथ एनिवर्सरी है. यह दिन न सिर्फ एक बेमिसाल एक्ट्रेस को याद करने का है, बल्कि दुनिया जिसे ‘पाकीजा’ के नाम से जानती है, उसकी ‘तपस्या’ को भी श्रद्धांजलि देने का है. 14 साल के संघर्ष, पर्सनल रिश्तों के उतार-चढ़ाव और एक गंभीर बीमारी के बाद बनी ‘पाकीजा’ बॉलीवुड हिस्ट्री की सबसे मशहूर फिल्मों में से एक है. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो कमाल अमरोही के डायरेक्शन में बनी इस फिल्म को एक समय डिस्ट्रीब्यूटर्स ने ‘आउटडेटेड’ कहकर रिजेक्ट कर दिया था, लेकिन मीना कुमारी की मौत ने फिल्म को ऐसी ऊंचाई पर पहुंचा दिया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी. अपनी रिलीज के लिए खरीदार ढूंढने के लिए संघर्ष कर रही इस फिल्म ने बॉक्स ऑफिस के सारे पिछले रिकॉर्ड तोड़ दिए.
नई दिल्ली. आज भॉलीवुड की ‘ट्रेजेडी क्वीन’ मीना कुमारी की डेथ एनिवर्सरी है. 31 मार्च 1972 को जब वह इस दुनिया से गईं तो अपने पीछे एक ऐसी विरासत छोड़ गईं जिसकी बराबरी कोई दूसरा कलाकार नहीं कर सकता. आज फिल्मी दुनिया में हमेशा याद रहने वाली फिल्म ‘पाकीजा’ का जिक्र होता है, जिसे बनाने में डायरेक्टर कमाल अमरोही ने 14 साल लगाए थे. मजे की बात यह है कि जब फिल्म पूरी हुई तो कोई भी डिस्ट्रीब्यूटर इसे खरीदने को तैयार नहीं था. यह एक कलाकार के डेडिकेशन, एक डायरेक्टर के पक्के भरोसे और एक ऐसी फिल्म की कहानी है जिसने रिलीज होते ही बॉक्स ऑफिस के सारे स्टैंडर्ड तोड़ दिए. (तस्वीर AI की मदद से बनाई गई है.)

कमाल अमरोही ने 1950 के दशक के आखिर में ‘पाकीजा’ का सपना देखा था. वह चाहते थे कि यह उनकी पत्नी मीना कुमारी के लिए एक यादगार फिल्म बने, एक ऐसी फिल्म जिसे दुनिया सदियों तक याद रखे. शूटिंग 1958 में शुरू हुई. उस समय फिल्म ब्लैक एंड व्हाइट में शूट हो रही थी, लेकिन जैसे-जैसे टेक्नोलॉजी बदली और कलर सिनेमा का जमाना आया, कमाल अमरोही ने जोर दिया कि पूरी फिल्म को कलर में दोबारा शूट किया जाए.

इस बीच, मीना कुमारी और कमाल अमरोही के पर्सनल रिश्ते खराब हो गए. वे अलग हो गए, और फिल्म पर काम पूरी तरह रुक गया. ‘पाकीजा’ के बक्सों पर धूल जमने लगी, और पूरी फिल्म इंडस्ट्री में अफवाह फैल गई कि फिल्म कभी पूरी नहीं होगी. 1968 में सुनील दत्त और नरगिस के जोर देने पर मीना कुमारी और कमाल अमरोही ‘पाकीजा’ को फिर से पूरा करने के लिए राजी हो गए, लेकिन तब तक समय बीत चुका था. मीना कुमारी एक गंभीर बीमारी, लिवर सिरोसिस से जूझ रही थीं. उनकी हालत इतनी खराब थी कि वे ज्यादा देर तक खड़ी भी नहीं रह सकती थीं.
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फिल्म के मशहूर गानों, खासकर ‘ठाड़े रहियो’ की शूटिंग के दौरान मीना कुमारी के चेहरे के क्लोज-अप लिए गए, जबकि डांस स्टेप्स के लिए एक बॉडी डबल (पद्मा खन्ना) की जरूरत थी. आंखों में आंसू लिए कमाल अमरोही अपनी बीमार पत्नी का रोल स्क्रीन पर ‘पाकीजा’ के तौर पर कर रहे थे. 1971 के आखिर तक, जब फिल्म पूरी हुई तो बॉलीवुड का मार्केट पूरी तरह बदल चुका था.

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो जो कहानी 14 साल पहले मॉडर्न लगती थी, अब डिस्ट्रीब्यूटर्स को पुरानी लग रही थी. कोठे और प्रॉस्टिट्यूट की इस कहानी के लिए कोई खरीदार नहीं आ रहा था. फिल्म कई महीनों तक रिलीज के लिए लटकी रही. कोई भी सिनेमा मालिक इसे प्राइम टाइम स्लॉट देने को तैयार नहीं था. आखिर में कमाल अमरोही ने एक बड़ा रिस्क लेते हुए फिल्म को खुद रिलीज करने का फैसला किया.

‘पाकीजा’ 4 फरवरी 1972 को रिलीज हुई थी. शुरू में रिस्पॉन्स ठंडा था, लेकिन फिर वह दिन आया जिसने फिल्म की किस्मत बदल दी. मीना कुमारी 31 मार्च 1972 को गुजर गईं. जैसे ही उनकी मौत की खबर फैली, देश भर के सिनेमा हॉल ‘पाकीजा’ देखने के लिए लोगों से भर गए. लोग अपनी पसंदीदा एक्ट्रेस को आखिरी बार स्क्रीन पर देखने के लिए दौड़ पड़े. डिस्ट्रीब्यूटर द्वारा रिजेक्ट की गई इस फिल्म ने मुंबई के मिनर्वा टॉकीज में अपनी सिल्वर जुबली मनाई. टिकट खिड़की पर इतनी भीड़ थी कि पुलिस को लाठीचार्ज करना पड़ा.

फिल्म ने अपने समय में करोड़ों की कमाई की और इसे ऑल टाइम क्लासिक का दर्जा दिलाया. गुलाम मोहम्मद का म्यूजिक और नौशाद का बैकग्राउंड स्कोर इस फिल्म की जान हैं. ‘चलते चलते’, ‘इन्हीं लोगों ने’ और ‘मौसम है आशिकाना’ जैसे गाने आज भी हर घर में गूंजते हैं. मीना कुमारी की आंखों की उदासी और उनके डायलॉग की गहराई ने दर्शकों को इतना बांध लिया कि ‘पाकीजा’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि एक एहसास बन गई.


