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अमेरिका का खेल खत्‍म! चीन ने की ऐसी तगड़ी घेरेबंदी, अब पूरा होगा ईरान का बदला – china revenge iran america invasion submarine warfare hormuz strait

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Published On: March 25, 2026

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China Submarine Warfare: ईरान पर अमेरिकी हमला क्‍या धरती के सबसे शक्तिशाली देश के लिए सबसे बड़ी भूल साबित होने जा रही है? क्‍या चीन अब खुलकर ईरान की तरफदारी करते हुए अमेरिका को चुनौती देने जा रहा है? चीन की तैयारियों को देखकर क्‍या डोनाल्‍ड ट्रंप की सेना डर गई है और यही वजह है कि अमेरिका किसी न किसी बहाने से ईरान जंग से खुद को पीछे करने में जुटा है? ऐसे सवाल इसलिए उठ रहे हैं, क्‍योंकि चाइनीज नेवी अब अमेरिका की दहलीज तक पहुंच चुकी है. गुआम से हवाई तक में चीनी पोत और सबमरीन की मौजूदगी के प्रमाण मिले हैं. यह मामला उस वक्‍त सामने आया है, जब अमेरिकी नौसेना ने श्रीलंका के तट से कुछ ही दूरी पर इंटरनेशनल वॉटर में ईरानी वॉरशिप IRIS डेना को सबमरीन अटैक में ध्‍वस्‍त कर दिया. चीन ने रिसर्च के नाम पर हिन्‍द महासागर से लेकर प्रशांत महासागर तक में 42 या उससे ज्‍यादा पोत भेज चुका है. इसके अलावा सबमरीन यानी पनडुब्‍बी भी लगातार अपने अभियान पर है. नेवल एक्‍सपर्ट का मानना है कि चीन के इस कैंपेन का सैन्‍य महत्‍व काफी ज्‍यादा है, क्‍योंकि इसके जरिये सी-बेड यानी समुद्र के सतह का पता लगा रहा है. अंडर-वॉटर या सबमरीन कैंपेन के जरिये समुद्री सतह का पता लगाया जा रहा है, ताकि वॉर टाइम में सबमरीन को हाइड यानी छुपाया जा सके और घात लगाकर दुश्‍मनों अटैक किया जा सके. बता दें कि डोनाल्‍ड ट्रंप ईरान वॉर में लगातार इंटरनेशनल को-ऑपरेशन की बत कर रहे हैं. वहीं, भारत से भी संवाद जारी है. चाइनीज नेवी के कैंपेन को देखते हुए अमेरिका के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह अपने क्षेत्र पर विशेष ध्‍यान दे.

जियो-पॉलिटिक्‍स में मैरीटाइम पावर यानी समुद्री ताकत की भूमिका तेजी से निर्णायक होती जा रही है. इसे देखते हुए चीन ने एक महत्वाकांक्षी अंडर-सी मैपिंग (समुद्र तल का नक्शा तैयार करने) और निगरानी अभियान शुरू किया है. यह अभियान प्रशांत, हिंद और आर्कटिक महासागरों तक फैला हुआ है. रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सीधा संबंध पनडुब्बी युद्ध (Submarine Warfare) में बढ़त हासिल करने से है, खासकर अमेरिका और उसके सहयोगियों के खिलाफ संभावित रणनीतिक मुकाबले को ध्यान में रखते हुए. रिपोर्टों के अनुसार, चीन दर्जनों शोध पोतों (Research Vessle) और सैकड़ों समुद्री सेंसरों के जरिए समुद्र के भीतर की परिस्थितियों का माइक्रो स्‍टडी कर रहा है. यह अध्ययन केवल वैज्ञानिक या आर्थिक उद्देश्यों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे सैन्य रणनीति भी छिपी हुई है. विशेषज्ञों के मुताबिक, समुद्र की गहराइयों की यह विस्तृत जानकारी किसी भी देश को सबमरीन ऑपरेशन और दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाने में अहम बढ़त देती है.

मलक्‍का स्‍ट्रेट की मॉनिटरिंग

इस अभियान का एक प्रमुख उदाहरण ‘डोंग फांग होंग-3’ नामक शोध पोत है, जिसे चीन के ओशन यूनिवर्सिटी द्वारा संचालित किया जाता है. यह पोत वर्ष 2024 और 2025 के दौरान ताइवान, गुआम और हिंद महासागर के कई रणनीतिक क्षेत्रों में सक्रिय रहा. शिप ट्रैकिंग डेटा के मुताबिक, इसने जापान के आसपास समुद्री सेंसरों की निगरानी की, वहीं श्रीलंका और इंडोनेशिया के बीच मलक्का जलडमरूमध्य के पास भी व्यापक सर्वेक्षण किया. यह इलाका वैश्विक समुद्री व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है. हालांकि, चीन का दावा है कि ये गतिविधियां जलवायु अध्ययन और समुद्री तल की मिट्टी के विश्लेषण जैसे वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए हैं, लेकिन कई रक्षा विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं. उनका कहना है कि इन सर्वेक्षणों से प्राप्त डेटा चीन को समुद्र के भीतर की भौगोलिक संरचना, वॉटर टेम्‍प्रेचर, लवणता और ध्वनि तरंगों के व्यवहार जैसी अहम जानकारियां देता है, जो पनडुब्बी संचालन के लिए बेहद महत्वपूर्ण होती हैं.

चीनी रिसर्च वेसल डॉन्‍ग फेंग लगातार अभियान पर है. (फोटो: Reuters)

चीन का मैरीटाइम कैंपेन अहम क्‍यों?

पनडुब्बी युद्ध में ध्वनि यानी साउंड की भूमिका बेहद अहम होती है. पनडुब्बियां अक्सर सोनार सिस्टम के जरिए दुश्मन की गतिविधियों का पता लगाती हैं, लेकिन ध्वनि तरंगों का व्यवहार समुद्र की गहराई, तापमान और अन्य कारकों के अनुसार बदलता रहता है. ऐसे में यदि किसी देश के पास इन सभी कारकों का विस्तृत डेटा हो, तो वह न केवल अपनी पनडुब्बियों को बेहतर तरीके से छिपा सकता है, बल्कि दुश्मन की पनडुब्बियों का सटीक पता भी लगा सकता है. विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की यह पहल सिविल-मिलिट्री फ्यूजन रणनीति का हिस्सा है, जिसे राष्ट्रपति शी जिनपिंग के नेतृत्व में बढ़ावा दिया गया है. इस रणनीति के तहत वैज्ञानिक अनुसंधान और सैन्य विकास को एकीकृत किया जाता है, ताकि नागरिक क्षेत्र में होने वाले शोध का उपयोग रक्षा क्षमताओं को मजबूत करने में किया जा सके.

42 रिसर्च वेसल से मैपिंग

रिपोर्ट के अनुसार, चीन ने कम से कम 42 शोध पोतों की गतिविधियों का विश्लेषण किया गया है, जिनमें से कई समुद्र तल की मैपिंग में लगे हुए हैं. ये पोत समुद्र में एक निश्चित पैटर्न में आगे-पीछे चलते हैं, जिससे वे बेहद सटीक नक्शा तैयार कर पाते हैं. इसके अलावा, कई पोत ऐसे उपकरणों से लैस हैं, जो समुद्र के भीतर सेंसर स्थापित करने और डेटा संग्रह करने में सक्षम हैं. चीन का यह अभियान खासतौर पर उन क्षेत्रों पर केंद्रित है, जो सैन्य दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं. इनमें फिलीपींस के आसपास का इलाका, गुआम और हवाई के पास के समुद्री क्षेत्र तथा प्रशांत महासागर में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकाने शामिल हैं. इसके अलावा चीन ने पापुआ न्यू गिनी और ऑस्ट्रेलिया के पास भी समुद्री सर्वेक्षण किया है, जो यह दर्शाता है कि उसका ध्यान केवल अपने आसपास के क्षेत्रों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह वैश्विक स्तर पर अपनी पहुंच बढ़ाना चाहता है.

चीन सबमरीन वॉरफेयर को दुरुस्‍त करने का लगातार प्रयास कर रहा है. (फोटो: Reuters)

हिन्‍द महासागर में भी गतिविधियां तेज

हिंद महासागर में भी चीन की गतिविधियां तेज हो गई हैं. यह क्षेत्र चीन के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यहां से होकर उसकी ऊर्जा आपूर्ति का बड़ा हिस्सा गुजरता है. विशेषज्ञों का मानना है कि इस क्षेत्र में समुद्र तल की मैपिंग से चीन भविष्य में अपनी पनडुब्बी गतिविधियों को और मजबूत कर सकता है. आर्कटिक क्षेत्र में भी चीन की बढ़ती दिलचस्पी साफ नजर आ रही है. उसने अलास्का के पास समुद्र तल का सर्वेक्षण किया है और खुद को 2030 तक पोलर पावर बनाने का लक्ष्य रखा है. आर्कटिक को भविष्य के व्यापारिक और सामरिक मार्ग के रूप में देखा जा रहा है, जहां बर्फ पिघलने के कारण नए समुद्री रास्ते खुल रहे हैं.

अमेरिका में खलबली

अमेरिकी नौसेना और रक्षा विशेषज्ञ इस पूरे घटनाक्रम को गंभीर चिंता के रूप में देख रहे हैं. उनका मानना है कि दशकों से अमेरिका को समुद्री युद्ध क्षेत्र में जो बढ़त हासिल थी, वह अब धीरे-धीरे कम हो रही है. चीन के इस व्यापक अभियान से उसे समुद्र के भीतर की परिस्थितियों की गहरी समझ मिल रही है, जिससे वह भविष्य में किसी भी संभावित संघर्ष में अधिक प्रभावी भूमिका निभा सकता है. हालांकि, अमेरिका भी समुद्र तल की मैपिंग करता है, लेकिन वह मुख्य रूप से सैन्य जहाजों के जरिए यह काम करता है, जो अक्सर अपनी गतिविधियों को सार्वजनिक ट्रैकिंग सिस्टम से छिपा सकते हैं. इसके विपरीत चीन नागरिक शोध पोतों का उपयोग कर रहा है, जिससे उसकी गतिविधियां अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती हैं, लेकिन कई बार ये पोत भी ट्रैकिंग सिस्टम बंद कर देते हैं.

ग्‍लोबल मैरीटाइम पावर बनने की चाहत

विशेषज्ञों के अनुसार, चीन का यह अभियान केवल संसाधनों की खोज तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उसके वैश्विक समुद्री शक्ति बनने की महत्वाकांक्षा का हिस्सा है. यह न केवल उसकी रक्षा क्षमताओं को मजबूत करेगा, बल्कि उसे समुद्री व्यापार मार्गों और रणनीतिक क्षेत्रों पर अधिक नियंत्रण भी दिला सकता है. समुद्र की गहराइयों में चल शक्ति प्रदर्शन आने वाले समय में वैश्विक शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकती है. चीन का यह कदम यह संकेत देता है कि भविष्य के युद्ध केवल जमीन और आसमान तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि समुद्र के भीतर भी निर्णायक लड़ाई लड़ी जाएगी.

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