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नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा में कई ऐसी फिल्में रही हैं जिन्हें दर्शकों और क्रिटिक्स ने ऑस्कर के लिए पूरी तरह योग्य माना, लेकिन वो फिल्में एकेडमी अवॉर्ड्स के फाइनल नॉमिनेशन्स तक नहीं पहुंच पाई थीं. इन फिल्मों के ऑस्कर में जीत न दर्ज कर पाने पर भारत में अक्सर बहस छिड़ी रहती हैं. कई क्रिटिक्स अक्सर इसका कारण फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) द्वारा चुनी गई फिल्मों को बताते हैं. सोशल मीडिया पर चर्चाएं रहती हैं कि कई बेहतरीन फिल्मों को ऑस्कर के लिए नहीं भेजा गया है.
आज बॉलीवुड की उन फिल्मों पर एक नजर डालते हैं जो दर्शकों की नजर में ऑस्कर पाने की हकदार रहीं, लेकिन इन फिल्मों को फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया की तरफ से ऑस्कर के लिए ऑफिशियल एंट्री नहीं बनाया गया. कई प्रतिष्ठित फिल्म फेस्टिवल में सराहना पाने के बावजूद इन फिल्मों को ऑस्कर के लिए नहीं भेजा गया.

लंच बॉक्स (2013)- यह ऑस्कर के इतिहास में भारत की तरफ से सबसे बड़ी गलती मानी जाती है. रितेश बत्रा द्वारा निर्देशित और इरफान खान- निम्रत कौर स्टारर इस फिल्म को कान्स फिल्म फेस्टिवल में जबरदस्त सराहना मिली थी. क्रिटिक्स का मानना था कि इसके पास ऑस्कर जीतने का सबसे मजबूत मौका था, लेकिन भारत ने इसकी जगह गुजराती फिल्म ‘द गुड रोड’ को भेजा, जो नॉमिनेशन में भी अपनी जगह बनाने में असफल रही थी. 2013 में ‘द लंचबॉक्स’ के बजाय ‘द गुड रोड’ को भेजने पर अनुराग कश्यप और करण जौहर जैसे कई फिल्म निर्माताओं ने सार्वजनिक रूप से अपनी नाराजगी जाहिर की थी.

ब्लैक (2005)- संजय लीला भंसाली की इस फिल्म को बॉलीवुड की बेहतरीन फिल्मों में गिना जाता है. अमिताभ बच्चन और रानी मुखर्जी स्टारर फिल्म ‘ब्लैक’ को नेशनल अवॉर्ड भी मिला था, लेकिन फिल्म को ऑस्कर के लिए भारत की तरफ से नहीं भेजा गया था.
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इसी साल शाहरुख खान और रानी मुखर्जी की ‘पहेली’ भी आई थी. इस फिल्म को भारत ने अपनी ऑफिशियल एंट्री के तौर पर भेजा था जिसकी उन दिनों काफी आलोचना भी हुई थी. कई लोगों का मानना था कि ‘ब्लैक’ की कहानी और अभिनय अंतरराष्ट्रीय जूरी को ज्यादा प्रभावित कर सकते थे. ऑस्कर के लिए भारतीय फिल्मों के चयन पर कई बार सवाल उठ चुके हैं.

सरदार उधम (2021)- शूजित सरकार की इस फिल्म को इसकी सिनेमेटोग्राफी और विक्की कौशल के अभिनय के लिए वैश्विक स्तर पर सराहा गया. हालांकि, जूरी ने इसे यह कहकर रिजेक्ट कर दिया था कि यह फिल्म ‘अंग्रेजों के प्रति बहुत अधिक नफरत दिखाती है’, जिससे एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया था. इस कारण के चलते ‘सरदार उधम’ भारत की ऑफिशियल एंट्री भी नहीं बन पाई थी.

स्वदेश (2004)- आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ ऑस्कर में टॉप 5 तक जगह बनाने में सफल रही थी. फिल्म जीत के बेहद करीब थी. दूसरी बार भी आशुतोष की फिल्म ‘स्वदेश’ को एकेडमी अवॉर्ड्स के प्रबल दावेदार के तौर पर देखा जा रहा था, लेकिन भारत ने उस साल इस फिल्म की बजाय मराठी फिल्म ‘श्वास’ को भेजा था, लेकिन ये टॉप 5 में अपनी जगह नहीं बना पाई थी.

उड़ान (2010)- विक्रमादित्य मोटवाने की इस फिल्म को कान्स फिल्म फेस्टिवल (अनसर्टन रिगार्ड कैटेगरी) में स्टैंडिंग ओवेशन मिला था और इसे ऑस्कर के लिए एक मजबूत दावेदार माना जा रहा था. फिल्म फेडरेशन ऑफ इंडिया (FFI) ने इसकी जगह अनुषा रिजवी द्वारा निर्देशित फिल्म ‘पीपली लाइव’ को भेजा था.

मसान (2015)- नीरज घेवान की इस फिल्म ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में दो बड़े पुरस्कार जीते थे, जिससे इसे वैश्विक पहचान मिल चुकी थी. इसके बावजूद इसे अनदेखा कर दिया गया.उस साल भारत की ओर से चैतन्य तम्हाणे की मराठी फिल्म ‘कोर्ट’ (Court) को ऑफिशियल एंट्री के तौर पर भेजा गया था, जो जीत नहीं पाई.

गैंग्स ऑफ वासेपुर( 2012)- अब बात करते हैं अनुराग कश्यप की गैंग्स ऑफ वासेपुर की. इस फिल्म की गिनती आज बॉलीवुड के इतिहास में क्लासिक कल्ट फिल्मों में होती है. फिल्म की कहानी और स्क्रिप्ट इतनी मजबूत थी कि एक वर्ग का मानना था कि इसे ऑस्कर के लिए भेजना चाहिए था.


