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80 के दशक में बॉलीवुड में एक सुनामी आई, जिसने सुपरस्टार अमिताभ बच्चन की गद्दी हिला दी. वह सुनामी विनोद खन्ना थे. ‘कुर्बानी’ और ‘अमर अकबर एंथनी’ जैसी फिल्मों से सनसनी मचाने वाले विनोद खन्ना उस दौर के सबसे महंगे और डिमांड वाले एक्टर बन गए थे. उनके स्टाइल, मस्कुलर फिजीक और गहरी आवाज ने उन्हें औरों से अलग बना दिया था. आज हम आपको विनोद खन्ना की उन 20 फिल्मों के बारे में बताने जा रहे हैं, जिनसे अमिताभ बच्चन का स्टाडरम खतरे में पड़ने लगा था.
नई दिल्ली. 70 और 80 का दशक ‘एंग्री यंग मैन’ अमिताभ बच्चन का दौर था, लेकिन उस दौर में एक एक्टर ऐसा भी था जिसने न सिर्फ बिग बी को कड़ी टक्कर दी बल्कि उनके स्टारडम के लिए सबसे बड़ा खतरा भी खड़ा किया. वह नाम था विनोद खन्ना. एक ऐसी पर्सनैलिटी जिसका स्वैग, कद-काठी और एक्टिंग स्किल्स उस दौर के हर नौजवान का सपना था. (तस्वीर बनाने में AI की मदद ली गई है)

विनोद खन्ना की सफलता ऐसी थी कि फिल्म क्रिटिक्स और ट्रेड पंडितों ने उन्हें ‘अगला नंबर वन’ घोषित कर दिया था. आइए, आज हम आपको उन 20 फिल्मों के बारे में बताते हैं, जिनके जरिए विनोद खन्ना ने बॉलीवुड में धूम मचा दी थी. विनोद खन्ना ने अपने करियर की शुरुआत एक विलेन के तौर पर की थी, लेकिन जल्द ही अपनी कड़ी मेहनत से लीड हीरो बन गए. उनकी इन फिल्मों ने रिकॉर्ड तोड़ बॉक्स ऑफिस कलेक्शन किया.

अपने करियर की शुरुआत में, उन्होंने ‘मुकद्दर का सिकंदर’ में भले ही सपोर्टिंग रोल किया हो, लेकिन उनकी स्क्रीन प्रेजेंस ने दर्शकों का दिल जीत लिया. इसी तरह ‘अमर अकबर एंथनी’ में अमर के रोल में उनकी सादगी और ‘हेरा फेरी’ में एक्शन और कॉमेडी के उनके मिक्स ने साबित कर दिया कि वे किसी भी बड़े स्टार को टक्कर दे सकते हैं. ‘परवरिश’ में उनके काम ने लीड एक्टर से ज्यादा ध्यान खींचा, जबकि फिरोज खान की ‘कुर्बानी’ ने उन्हें अल्टीमेट स्टाइल आइकन के तौर पर स्थापित किया.
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‘खून पसीना’ जैसी फिल्मों में अमिताभ बच्चन के साथ उनके क्लैश ने थिएटर में सीटियां बजवाईं, जबकि ‘द बर्निंग ट्रेन’ जैसी मल्टी-स्टारर फिल्मों में भी उन्होंने अपनी लीडिंग मैन इमेज को पूरे जोश के साथ बनाए रखा. विनोद खन्ना के टैलेंट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें ‘हाथ की सफाई’ के लिए बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला और ‘मेरा गांव मेरा देश’ में विलेन, डाकू जब्बार सिंह के उनके रोल ने उन्हें घर-घर में मशहूर कर दिया.

‘इंतिहान’ में एक आइडियल टीचर के तौर पर उनकी सादगी ने सबका दिल जीत लिया. 80 के दशक के बीच में उन्होंने ‘इंसाफ’ से जबरदस्त धूम मचाई, जिससे उनकी पॉपुलैरिटी बनी रही. ‘दयावान’ में उनकी सीरियस परफॉर्मेंस और ‘जुर्म’ में एवरग्रीन गाने ‘जब कोई बात बिगड़ जाए’ से उनकी रोमांटिक इमेज फिर से जिंदा हो गई.

उन्होंने ‘चांदनी’ में एक सीरियस लवर के रोल और ‘बंटवारा’ और ‘क्षत्रिय’ जैसी फिल्मों में अपने राजपूती अंदाज से दर्शकों को लुभाया. एक्शन के मामले में ‘महासंग्राम’ और उनकी यूनिफॉर्म का ऑरा ‘पुलिस और मुजरिम’ ने उनके मजबूत इरादों को दिखाया. उनके रिटायरमेंट से ठीक पहले रिलीज हुई ‘रिश्ते कागज का’ और हेलेन के साथ उनकी बेहतरीन केमिस्ट्री ‘लहू के दो रंग’ आज भी उनकी एक्टिंग वर्सेटिलिटी की गवाही देती हैं. इन फिल्मों ने मिलकर ऐसा धमाल मचाया कि अमिताभ बच्चन की नंबर वन पोजिशन भी हिल गई.

मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो 70 के दशक के आखिर और 80 के दशक की शुरुआत में एक समय ऐसा था, जब मैगजीन कवर पर अमिताभ से ज्यादा विनोद खन्ना होते थे. डिस्ट्रीब्यूटर अमिताभ की फिल्मों से ज्यादा कीमत पर विनोद खन्ना की फिल्में खरीदने को तैयार रहते थे. उनकी फिजीक और जबरदस्त लुक ने उन्हें ‘द कम्प्लीट मैन’ का टाइटल दिलाया. कहा जाता है कि अगर विनोद खन्ना 1982 में ओशो के पास नहीं गए होते, तो अमिताभ बच्चन शायद ही नंबर वन होते. अमिताभ बच्चन ने खुद कई इंटरव्यू में माना है कि विनोद खन्ना की पर्सनैलिटी ने उन्हें हमेशा कड़ा कॉम्पिटिशन दिया था.


