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16 की उम्र में किया मन्ना डे संग काम, 60 साल से ज्यादा लंबा है करियर, कई हिट गाने गाकर बनाई अलग पहचान

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Published On: March 17, 2026

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मराठी संगीत और खासकर लावणी गायकी की बात हो और सुलोचना चव्हाण का नाम न आए, ऐसा हो ही नहीं सकता. अपनी दमदार आवाज और खास अंदाज से उन्होंने लावणी को नई पहचान दिलाई. दिलचस्प बात यह है कि उन्होंने संगीत की कोई औपचारिक पढ़ाई नहीं की थी. उन्होंने ग्रामोफोन रिकॉर्ड सुनकर ही गायन की बारीकियां सीखीं और अपनी मेहनत से खुद को एक बड़ी गायिका के रूप में स्थापित किया.

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कई हिट देकर बनाई बड़ी पहचान

नई दिल्ली. सुलोचना चव्हाण का जन्म 13 मार्च 1933 को मुंबई के फणसवाडी इलाके में हुआ था. बचपन से ही उन्हें गाने का बहुत शौक था. हालांकि उन्होंने कभी शास्त्रीय संगीत की ट्रेनिंग नहीं ली. वह घर पर ग्रामोफोन रिकॉर्ड सुनती थीं और उसी से सुर और ताल की समझ विकसित करती थीं. घंटों रिकॉर्ड सुनना और फिर उसी तरह गाने की कोशिश करना उनकी रोज की आदत बन गई थी. इसी लगन और अभ्यास ने उन्हें एक बेहतरीन गायिका बना दिया.

सुलोचना चव्हाण ने बहुत कम उम्र में ही अपने करियर की शुरुआत कर दी थी. उनका पहला गाना तब रिकॉर्ड हुआ, जब वह सिर्फ 9 साल की थीं. यह गाना हिंदी फिल्म ‘कृष्ण सुदामा’ के लिए रिकॉर्ड किया गया था. संगीतकार श्याम बाबू पाठक की मदद से उन्हें यह मौका मिला. इसके बाद उनका सफर लगातार आगे बढ़ता गया और वह धीरे-धीरे संगीत की दुनिया में पहचान बनाने लगीं.

16 की उम्र में किया मन्ना डे संग काम

अपने करियर के दौरान सुलोचना चव्हाण ने कई दिग्गज गायकों के साथ काम किया. उन्होंने मोहम्मद रफी, मन्ना डे, शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसे मशहूर कलाकारों के साथ गाने गाए. सिर्फ 16 साल की उम्र में उन्होंने मन्ना डे के साथ भोजपुरी रामायण के लिए भी गीत गाए. उनकी गायकी की ताकत और भावनात्मक अंदाज से मशहूर गायिका बेगम अख्तर भी काफी प्रभावित हुई थीं.

कई भाषाओं में गाए गाने

सुलोचना चव्हाण ने सिर्फ मराठी ही नहीं, बल्कि हिंदी, गुजराती, भोजपुरी, तमिल और पंजाबी भाषाओं में भी गाने गाए. हालांकि उन्हें असली पहचान लावणी गायकी से मिली. लावणी की दुनिया में उनका बड़ा मुकाम फिल्म ‘हीच माझी लक्ष्मी’ के एक गाने से मिला. इस गाने की सफलता के बाद उनका रुझान पूरी तरह लावणी की तरफ हो गया.मशहूर साहित्यकार और फिल्मकार आचार्य अत्रे ने उन्हें ‘लावणीसम्राज्ञी’ यानी लावणी की रानी की उपाधि दी थी. सुलोचना चव्हाण इस उपाधि को बड़े गर्व के साथ अपनाती थीं. उनका मानना था कि लावणी गाने की शुरुआत ही दमदार और जोरदार होनी चाहिए. यही वजह थी कि उनके गानों में शुरुआत से ही ऊर्जा और जोश नजर आता था.

अपने लंबे करियर में सुलोचना चव्हाण को कई बड़े सम्मान भी मिले. उन्हें साल 2010 में लता मंगेशकर पुरस्कार से सम्मानित किया गया. इसके बाद 2012 में उन्हें संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार मिला. साल 2022 में भारत सरकार ने उन्हें पद्मश्री से सम्मानित किया. इसके अलावा उन्हें लोकशाहीर पाटील बापूराव पुरस्कार और राम कदम पुरस्कार जैसे कई प्रतिष्ठित सम्मान भी मिले. करीब 60 साल से ज्यादा लंबे करियर में सुलोचना चव्हाण ने सोलो गाने, पार्श्वगायन और लाइव परफॉर्मेंस के जरिए दर्शकों के दिलों में खास जगह बनाई. उनकी आवाज और लावणी की खास शैली ने उन्हें संगीत की दुनिया में हमेशा के लिए अमर कर दिया.

बता दें कि सुलोचना चव्हाण का निधन 10 दिसंबर 2022 को 92 साल की उम्र में हुआ. लेकिन उनकी आवाज और उनके गाने आज भी लावणी संगीत के चाहने वालों के दिलों में जिंदा हैं.

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Munish Kumar

न्यूज 18 हिंदी में सीनियर सब एडिटर के तौर पर काम कर रहे मुनीष कुमार का डिजिटल मीडिया में 9 सालों का अनुभव है. एंटरटेनमेंट रिपोर्टिंग, लेखन, फिल्म रिव्यू और इंटरव्यू में विशेषज्ञता है. मुनीष ने जामिया मिल्लिया इ…और पढ़ें

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