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₹47055475000000 का नुकसान! क्या अमेरिका देगा भारत को हर्जाना? 1990 के बाद दुनिया की जेब से उड़ाए 10 ट्रिलियन डॉलर

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Published On: March 26, 2026

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नई दिल्ली: क्लाइमेट चेंज दुनिया की अर्थव्यवस्था को दीमक की तरह चाट रहा है. हाल ही में ‘नेचर’ जर्नल में छपी एक रिसर्च के मुताबिक, साल 1990 के बाद से अमेरिका के कार्बन उत्सर्जन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था को करीब 10 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 9,40,335 करोड़ रुपये) का नुकसान पहुंचाया है. यह आंकड़ा इतना बड़ा है कि कई छोटे देशों की कुल जीडीपी भी इसके सामने कुछ नहीं है. अमेरिका इतिहास का सबसे बड़ा कार्बन उत्सर्जक रहा है और अब उसके किए का खामियाजा पूरी दुनिया भुगत रही है. रिसर्च बताती है कि इस आर्थिक चोट का एक चौथाई हिस्सा खुद अमेरिका को भी झेलना पड़ा है, लेकिन असली दर्द उन देशों को मिला है जिनका इस प्रदूषण में बहुत कम हाथ था.

भारत और ब्राजील बने अमेरिकी प्रदूषण के सबसे बड़े शिकार!

इस स्टडी में सबसे डराने वाले आंकड़े भारत के लिए सामने आए हैं. रिसर्च के अनुसार, अमेरिकी उत्सर्जन की वजह से भारत को लगभग 500 अरब डॉलर (करीब 4,70,55,47,50,00,000 रुपये) का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ा है. वहीं ब्राजील को 330 अरब डॉलर की चपत लगी है.

स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के पर्यावरण वैज्ञानिक मार्शल बर्क ने इस रिसर्च का नेतृत्व किया है. उनका कहना है कि यह नुकसान अचानक नहीं हुआ, बल्कि धीरे-धीरे जमा होता गया. इसे ‘डेथ बाय अ थाउजेंड कट्स’ यानी हजारों छोटे घावों से होने वाली मौत की तरह देखा जा सकता है.

गरीब और विकासशील देश लगातार मांग कर रहे हैं कि अमीर देश इस ‘लॉस एंड डैमेज’ की भरपाई करें, क्योंकि उन्होंने ही औद्योगिक क्रांति के नाम पर सबसे ज्यादा जहर हवा में घोला है.

क्यों चीन और अमेरिका के बीच मची है तबाही की होड़?

  • जब बात प्रदूषण और आर्थिक नुकसान की आती है, तो चीन भी अमेरिका से ज्यादा पीछे नहीं है. हालांकि वर्तमान में चीन दुनिया का सबसे बड़ा उत्सर्जक है, लेकिन 1990 से अब तक के ट्रैक रिकॉर्ड में अमेरिका टॉप पर है.

चीन की वजह से दुनिया को करीब 9 ट्रिलियन डॉलर का नुकसान हुआ है.

  • यह स्टडी साफ करती है कि कैसे बढ़ता तापमान मजदूरों की कार्यक्षमता को कम कर रहा है, फसलों को बर्बाद कर रहा है और पब्लिक हेल्थ सिस्टम पर बोझ बढ़ा रहा है.
  • जब गर्मी बढ़ती है, तो लोग कम काम कर पाते हैं और बीमारियां बढ़ती हैं, जिससे देश की ग्रोथ रेट गिर जाती है. पिछले 30 सालों में इन छोटे-छोटे असर ने मिलकर एक बहुत बड़ी आर्थिक तबाही का रूप ले लिया है.

डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों से और बढ़ेगा ग्लोबल खतरा!

क्लाइमेट चेंज के इस संकट के बीच अमेरिका की राजनीतिक स्थिति ने चिंता और बढ़ा दी है. डोनाल्ड ट्रंप ने लगातार इस मुद्दे पर सख्त रुख अपनाया है. उन्होंने अमेरिका को ‘लॉस एंड डैमेज’ फंड से बाहर कर दिया है और वैश्विक जलवायु समझौतों से भी दूरी बनाई है.

उनका ‘ड्रिल, बेबी, ड्रिल’ वाला नारा तेल और गैस उत्पादन को बढ़ावा देने पर केंद्रित है, जो पर्यावरण के लिए किसी खतरे से कम नहीं है. जानकारों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन के इन फैसलों से विकासशील देशों को मिलने वाली आर्थिक मदद रुक सकती है.

मार्शल बर्क का कहना है कि उनकी रिसर्च के आंकड़े ट्रंप प्रशासन को बातचीत की मेज पर वापस लाने के लिए मजबूर करने चाहिए, क्योंकि यह सिर्फ नैतिकता नहीं बल्कि जवाबदेही का मामला है.

क्या ये आंकड़े नुकसान की असली तस्वीर दिखाने के लिए काफी हैं?

यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया की विशेषज्ञ फ्रांसिस मूर का मानना है कि यह स्टडी बहुत जरूरी है, लेकिन शायद यह अभी भी पूरा सच नहीं बता रही है. उनके अनुसार, एक गरीब इंसान के लिए एक डॉलर खोना, किसी अमीर के डॉलर खोने से कहीं ज्यादा दर्दनाक होता है. रिसर्च में डॉलर की वैल्यू तो मापी गई है, लेकिन गरीब देशों के लोगों की भलाई (well-being) पर पड़ने वाले असर को पूरी तरह शामिल नहीं किया गया है.

हीटवेव, बाढ़ और सूखे की वजह से जो जिंदगियां बर्बाद हो रही हैं, उनका हिसाब रुपयों में करना नामुमकिन है. कोलंबिया बिजनेस स्कूल के अर्थशास्त्री गेर्नोट वैगनर कहते हैं कि भविष्य में होने वाले नुकसान से बचने के लिए अभी कदम उठाना निवेश जैसा होगा, वरना इसकी कीमत कई गुना ज्यादा चुकानी पड़ेगी.

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