नई दिल्ली. भारतीय सिनेमा के विशाल इतिहास में कुछ नाम ऐसे हैं, जो समय के साथ धुंधले नहीं पड़ते, बल्कि और भी रहस्यमयी और महान बन जाते हैं. सुचित्रा सेन उन्हीं चुनिंदा सितारों में शामिल हैं. उनकी खूबसूरती, अदाकारी और व्यक्तित्व ने उन्हें एक ऐसी पहचान दी, जो आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा है. लेकिन उनकी कहानी सिर्फ स्टारडम की नहीं, बल्कि उन फैसलों की भी है, जिन्होंने उन्हें भीड़ से अलग खड़ा किया. सुचित्रा सेन ने दादा साहब फाल्के पुरस्कार ठुकरा कर सबको हैरान कर दिया था.
6 अप्रैल 1931 को बंगाल (अब बांग्लादेश) के एक साधारण परिवार में जन्मी सुचित्रा सेन का असली नाम रोमा दास गुप्ता था. उनके पिता एक स्कूल के हेडमास्टर थे और मां गृहिणी. कम उम्र में ही उनकी शादी दीबानाथ सेन से हो गई. शादी के बाद उनकी जिंदगी ने एक नया मोड़ लिया. उनके पति ने ही उन्हें फिल्मों में कदम रखने के लिए प्रेरित किया, जिससे उनके भीतर छिपे कलाकार को पहचान मिली. शादी के एक साल बाद उन्होंने बेटी मुनमुन सेन को जन्म दिया, जो आगे चलकर खुद भी एक जानी-मानी अभिनेत्री बनीं. मुनमुन सेन ने मां के नक्शे कदम पर चलते हुए फिल्मों में अपनी अलग पहचान बनाई.
सुचित्रा सेन ने दिलीप कुमार की फिल्म ‘देवदास’ से डेब्यू किया था. (फोटो साभार: IANS)
बंगाली फिल्मों से की थी करियर की शुरुआत
सुचित्रा सेन ने अपने करियर की शुरुआत बंगाली सिनेमा से की. उनकी पहली फिल्म ‘शेष कोथाय’ रिलीज नहीं हो पाई, लेकिन ‘चौत्तोर’ ने उन्हें पहचान दिलाई. इसी फिल्म में उनकी जोड़ी उत्तम कुमार के साथ बनी, जो आगे चलकर भारतीय सिनेमा की सबसे प्रतिष्ठित जोड़ियों में गिनी जाने लगी. दोनों ने लगभग दो दशकों तक पर्दे पर जादू चलाया और सुचित्रा ने अपने करियर की 61 फिल्मों में से करीब 30 फिल्में उनके साथ की थीं.
हीरो से ज्यादा फीस लेती थीं एक्ट्रेस
हिंदी सिनेमा में भी उन्होंने अपनी अलग छाप छोड़ी. ‘देवदास’, ‘ममता’ और ‘आंधी’ जैसी फिल्मों में उनके अभिनय ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. खास बात यह थी कि सुचित्रा संवादों से ज्यादा अपनी आंखों और भावों से कहानी कहती थीं. उनके चेहरे का हर भाव दर्शकों के दिल तक सीधे पहुंचता था. यही वजह थी कि वह अपने समय की सबसे ज्यादा फीस लेने वाली अभिनेत्रियों में शामिल हो गईं.
फिल्म फ्लॉप होते ही गुमनामी के अंधेरे में खोईं एक्ट्रेस
सफलता के इस शिखर पर पहुंचने के बाद उनकी जिंदगी ने एक अप्रत्याशित मोड़ लिया. 1978 में उनकी फिल्म ‘प्रणय पाशा’ की असफलता ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया. इसके बाद उन्होंने फिल्मों से दूरी बना ली और धीरे-धीरे सार्वजनिक जीवन से भी खुद को अलग कर लिया. यह फैसला किसी सनसनी से कम नहीं था, क्योंकि एक सुपरस्टार का अचानक गुमनामी में जाना बेहद असामान्य था.
36 सालों तक गुमनामी में बिताई जिंदगी
इसके बाद शुरू हुआ उनका सबसे रहस्यमयी दौर. सुचित्रा सेन ने खुद को पूरी तरह एकांत में समेट लिया और करीब 36 वर्षों तक सार्वजनिक रूप से नजर नहीं आईं. न मीडिया, न सार्वजनिक कार्यक्रम उन्होंने हर तरह की लाइमलाइट से दूरी बना ली. इसी दौरान साल 2005 में उन्हें भारतीय सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजने का निर्णय लिया गया, लेकिन उन्होंने यह सम्मान लेने से इनकार कर दिया, क्योंकि वह सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आना चाहती थीं. यह फैसला उनके व्यक्तित्व की दृढ़ता और अपने सिद्धांतों के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है.
17 जनवरी 2014 को सुचित्रा सेन इस दुनिया को अलविदा कह गईं, लेकिन उनकी आखिरी इच्छा भी उतनी ही अनोखी थी, जितनी उनकी जिंदगी. उनकी इच्छा थी कि उनके निधन के बाद भी उनका चेहरा किसी को न दिखाया जाए. उनके परिवार ने उनकी इस इच्छा का पूरा सम्मान किया.


