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70 और 80 के दशक में बॉलीवुड में एक तरफ ‘एंग्री यंग मैन’ अमिताभ बच्चन का रुतबा था, तो दूसरी तरफ हिट मशीन ‘जंपिंग जैक’ जितेंद्र की स्पीड. हैरानी की बात है कि दशकों तक इंडस्ट्री पर राज करने के बावजूद, ये दोनों सुपरस्टार अपने पूरे करियर में सिर्फ एक ही फिल्म में साथ दिखे. वह कौन सी फिल्म थी और वह एक वजह क्या थी, जिसने इस दमदार जोड़ी को दोबारा स्क्रीन शेयर करने से रोक दिया? तो आइए, आज हम आपको इसके पीछे की वजह बताने की कोशिश करते हैं.
नई दिल्ली. बॉलीवुड का इतिहास कई शानदार जोड़ियों से भरा पड़ा है. हमने अमिताभ को ‘शोले’ में धर्मेंद्र के साथ, विनोद खन्ना को ‘अमर अकबर एंथनी’ में और ऋषि कपूर को ‘नसीब’ में देखा. लेकिन जब जितेंद्र की बात आती है, तो दर्शकों को ऐसी कोई फिल्म याद नहीं आती जिसमें दोनों साथ दिखे हों. जबकि असलियत यह है कि 1973 में एक सस्पेंस थ्रिलर ने इन दोनों लेजेंड्स को एक साथ लाया, लेकिन वह मिलन उनका आखिरी साबित हुआ.

गहरी चाल: साल 1973 बॉलीवुड के लिए एक क्रांतिकारी साल था. उस साल ‘जंजीर’ रिलीज हुई, जिसने अमिताभ बच्चन को रातोंरात सुपरस्टार बना दिया. इसी दौरान डायरेक्टर श्रीधर ‘गहरी चाल’ नाम की एक फिल्म लेकर आए. फिल्म में जितेंद्र और हेमा मालिनी लीड रोल में थे, जबकि अमिताभ बच्चन ने एक अहम ग्रे-शेडेड किरदार निभाया था.

यह फिल्म एक मर्डर मिस्ट्री और एक सस्पेंस थ्रिलर थी. उस समय जितेंद्र एक जाने माने स्टार थे, जबकि अमिताभ अपने स्ट्रगल के दिनों से उभरकर अपनी पहचान बना रहे थे. फिल्म में दोनों के बीच कई दमदार सीन थे और दर्शकों को लगा कि बॉलीवुड को एक नई सुपरहिट जोड़ी मिल गई है, लेकिन इतिहास को कुछ और ही मंजूर था. इस फिल्म के बाद दोनों कभी साथ पर्दे पर नजर नहीं आए. मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो ‘गहरी चाल’ के बाद इस जोड़ी के कभी साथ न आने की सबसे बड़ी वजह इमेज और स्टारडम के बीच कॉम्पिटिशन थी.
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1973 के बाद, अमिताभ बच्चन की इमेज एक ‘एंग्री यंग मैन’ की बन गई. वे बगावत करने वाले और सिस्टम से लड़ने वाले हीरो बन गए. इस बीच जितेंद्र ने खुद को एक रोमांटिक और डांसिंग स्टार के तौर पर स्थापित कर लिया था. डायरेक्टर्स के लिए सबसे बड़ा चैलेंज यह था कि ऐसी स्क्रिप्ट कैसे बनाई जाए जो बिल्कुल अलग स्टाइल वाले इन दो हीरो को बराबर फुटेज और इंपॉर्टेंस दे. जितेंद्र उस समय अपनी फिल्मों के कैप्टन थे और उन्होंने ऐसी फिल्मों में काम करना शुरू किया जो मुख्य रूप से उनके इर्द-गिर्द घूमती थीं. दूसरी ओर, अमिताभ बच्चन की हर फिल्म वन मैन शो बनती जा रही थी. इसलिए उस वक्त ये कहा जाता था कि दो सूरज, जो अपनी-अपनी चमक से पूरी इंडस्ट्री को रोशन कर रहे थे, एक ही आसमान में समा नहीं सकते थे.

वहीं, 1970 के दशक के आखिर में जितेंद्र ने एक बड़ा स्ट्रेटेजिक फैसला लिया. उन्होंने मुंबई छोड़ दिया और मद्रास में एक प्रोडक्शन हाउस के साथ काम करना शुरू कर दिया. वे साउथ इंडियन फिल्मों के हिंदी रीमेक के किंग बन गए. उनकी ‘ज्योति बने ज्वाला’, ‘आशा’ और ‘मवाली’ जैसी फिल्में एक अलग ऑडियंस को पसंद आईं. दूसरी ओर, अमिताभ बच्चन मुंबई के बड़े बैनर (यश चोपड़ा, प्रकाश मेहरा और मनमोहन देसाई) के साथ क्लास और मास अपील दोनों चाहते थे. इन दोनों सुपरस्टार्स के काम करने का स्टाइल और लोकेशन इतने अलग हो गए थे कि उनके बीच किसी भी प्रोफेशनल कम्पैटिबिलिटी की कोई गुंजाइश ही नहीं थी.

1980 के दशक की शुरुआत तक, जितेंद्र और अमिताभ दोनों इंडस्ट्री के सबसे महंगे एक्टर्स में से एक बन गए थे. उन्हें एक साथ साइन करना उस दौर के प्रोड्यूसर्स के लिए आसान नहीं होता. कहा जाता है कि उस समय दोनों की फीस बहुत ज्यादा थी. साथ ही, किसी भी डायरेक्टर के लिए यह तय करना मुश्किल था कि पोस्टर पर पहले किसका नाम आएगा, या किसे ‘हीरो’ और किसे ‘एंटी-हीरो’ दिखाया जाएगा. अमिताभ ने ‘गहरी चाल’ में नेगेटिव रोल किया था.

हैरानी की बात है कि जितेंद्र और अमिताभ के बीच कभी किसी बड़े झगड़े या लड़ाई की खबर नहीं आई. वे हमेशा पब्लिक इवेंट्स में एक-दूसरे का सम्मान करते थे. ‘गहरी चाल’ ही एकमात्र सबूत है जो हमें बताता है कि अगर ये दोनों लेजेंड्स साथ काम करते रहते, तो हम कई और बेहतरीन फिल्में देख सकते थे. आज ये दोनों एक्टर सिनेमा के सबसे बड़े हीरों में से हैं, लेकिन उनका साथ हमेशा एक अधूरा सपना ही रहेगा.


