वॉशिंगटन. दक्षिण एशिया के लिए व्हाइट हाउस की पूर्व अधिकारी लिसा कर्टिस के अनुसार, ईरान के साथ चल रहे अमेरिकी सैन्य ऑपरेशन भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर दबाव डाल रहे हैं. पूर्व अमेरिकी अधिकारी का कहना है कि वर्तमान समय में ईरान और अमेरिका-इजरायल के बीच का तनाव भारत के लिए डिप्लोमैटिक संतुलन की परीक्षा है. भारत एक मुश्किल और लगातार बिगड़ती स्थिति से गुजर रहा है.
कर्टिस ने आईएएनएस को एक इंटरव्यू में बताया, “मुझे लगता है कि सबसे पहले, इसका असर भारत की तेल सप्लाई पर पड़ रहा है. भारत असल में मिडिल ईस्ट से आने वाले तेल पर निर्भर है, इसलिए मुझे यकीन है कि भारतीय अधिकारी तेल की बढ़ती कीमतों और इस संकट का भारतीय अर्थव्यवस्था पर क्या असर पड़ेगा, इसे लेकर बहुत चिंतित हैं.” कर्टिस ने भारत के लिए एनर्जी को तुरंत चिंता का विषय बताया, क्योंकि यह मिडिल ईस्ट के कच्चे तेल पर निर्भर है. संघर्ष से तेल की कीमतों में आई तेजी भारत के आर्थिक नजरिए पर असर डाल सकती है.
कर्टिस ने ईरान के खिलाफ हाल ही में अमेरिका की सैन्य कार्रवाई से पैदा हुई एक डिप्लोमैटिक मुश्किल की ओर इशारा किया. उन्होंने कहा, “अमेरिका ने भारत की मेजबानी में हुई नौसैनिक अभियान, एक बहुपक्षीय नौसैनिक अभियान में हिस्सा लेने के तुरंत बाद एक ईरानी जहाज पर हमला किया.” उन्होंने इसे भारत के लिए चिंता और आपसी संबंधों में तनाव का एक कारण बताया.
उन्होंने कहा कि भारत उम्मीद करता है कि वॉशिंगटन नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय ऑर्डर बनाए रखेगा. उन्होंने कहा, “भारत अमेरिका को एक जिम्मेदार देश के तौर पर देखता है और समुद्री रास्तों की आजादी की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्ध है. लेकिन, इस मामले में यह अमेरिका है जो उस नियम-आधारित व्यवस्था में रुकावट डालने वाले तरीके से काम कर रहा है.” उन्होंने कहा, “भारत, ज्यादा न्यूट्रल रुख अपनाने की कोशिश कर रहा है. वह ईरान के साथ मजबूत संबंधों को अमेरिका के साथ अपने आर्थिक और रणनीतिक संबंधों की अहमियत के साथ संतुलित कर रहा है.”
पूर्व अमेरिकी अधिकारी लिसा कर्टिस ने कहा कि भारत का नजरिया दूसरे अमेरिकी सहयोगियों जैसा ही है. जापान, ऑस्ट्रेलिया और ब्रिटेन जैसे देश यूएस के साथ मजबूत साझेदारी बनाए रखने के इस विचार को संतुलित करने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ऐसे युद्ध में नहीं पड़ना चाहते, जिसका वे हिस्सा नहीं हैं. कर्टिस ने यह भी कहा कि वॉशिंगटन अपनी ईरान नीति को लेकर तेजी से अलग-थलग पड़ता दिख रहा है. मुझे लगता है कि जब ईरान में सैन्य ऑपरेशन की बात आती है तो अमेरिका अपने बड़े सहयोगियों और साझेदारों से अलग-थलग पड़ गया है.
उन्होंने कहा कि सहयोगी देश सैन्य संपत्तियां देने में हिचकिचा रहे हैं. तमाम देश होर्मुज स्ट्रेट से तेल टैंकरों को ले जाने के लिए युद्धपोत नहीं भेजना चाहते. वे हो रही सैन्य कार्रवाई में शामिल नहीं होना चाहते. इसके बजाय, सभी देश साझेदारों की स्थिरता का समर्थन करने के लिए गैर-सैन्य तरीके ढूंढ रहे हैं. वे अमेरिका का समर्थन करना चाहते हैं. वे ऑयल टैंकरों के रिस्क को कम करने में मदद करने की कोशिश कर रहे हैं और वे मार्केट में रणनीतिक रिजर्व जारी करने की कोशिश कर रहे हैं.
द्विपक्षीय संबंधों पर कर्टिस ने कहा कि अमेरिका-भारत संबंध हाल ही में बेहतर हुए हैं. उन्होंने अंतरिम व्यापार फ्रेमवर्क समझौते के पूरा होने को एक अहम कदम बताया. उन्होंने जोर दिया कि रूसी तेल पर अमेरिका की नीति में बदलाव से भारत को फायदा हो सकता है. उन्होंने कहा, “अमेरिका रूस को तेल बेचने की इजाजत दे रहा है. इससे भारत को मदद मिलेगी. एनर्जी संकट से निपटने में अमेरिका भारत की मदद के लिए जो कुछ भी कर सकता है, उसका स्वागत है.”
कर्टिस ने चेतावनी देते हुए कहा कि वॉशिंगटन की नीतियों का अनिश्चित और अप्रत्याशित होना चिंता का कारण बन रहा है. यह ट्रंप सरकार की चंचलता और अनिश्चितता को दर्शाता है, जो अन्य देशों के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर रहा है. यही कारण है कि भविष्य में भारत, ट्रंप सरकार के साथ व्यवहार करते समय अधिक सतर्क रुख अपना सकता है.


