ईरान जंग में यूरोपीय देशों ने मदद क्या नहीं की, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप उखड़ गए. गुस्से में यहां तक कह दिया कि तुम हमारे काम नहीं आए तो हम भी तुम्हारे काम नहीं आने वाले. जरूरत लगी तो नाटो से भी हम अलग हो जाएंगे. लेकिन क्या ट्रंप के लिए नाटो को छोड़ना इतना आसान है? क्या अमेरिका का राष्ट्रपति अपनी मर्जी से 75 साल पुराने इस गठबंधन को खत्म कर सकता है?
नाटो क्या है और अमेरिका के लिए क्यों जरूरी है?
नाटो यानी नॉर्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गेनाइजेशन 32 देशों का एक सैन्य गठबंधन है. इसकी सबसे बड़ी ताकत आर्टिकल 5 है, जो कहता है कि अगर किसी एक सदस्य देश पर हमला होता है, तो उसे सभी सदस्यों पर हमला माना जाएगा.
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बना यह गठबंधन पूरी तरह से अमेरिकी सैन्य शक्ति और संसाधनों पर टिका है. अगर अमेरिका इससे हटता है, तो यह न केवल नाटो का अंत होगा, बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा व्यवस्था चरमरा जाएगी. इसे एक बड़ी वैश्विक आपदा माना जा रहा है.
ट्रंप के लिए क्यों मुश्किल है नाटो से निकलना?
डोनाल्ड ट्रंप भले ही राष्ट्रपति हैं, लेकिन अमेरिका में कानून सबसे ऊपर है. उनकी इस मंशा को रोकने के लिए अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस पहले ही किलेबंदी कर चुकी है.
नाटो संधि का ‘अनुच्छेद 13’
नाटो की स्थापना 1949 में एक संधि के माध्यम से हुई थी. इस संधि का अनुच्छेद 13 किसी भी देश को गठबंधन छोड़ने का अधिकार देता है. जो देश बाहर निकलना चाहता है, उसे अमेरिका की सरकार (जो इस संधि की संरक्षक है) को एक नोटिस देना होता है. नोटिस देने के ठीक एक साल बाद वह देश आधिकारिक तौर पर नाटो से बाहर माना जाता है. इस एक साल के दौरान उस देश को नाटो की सभी शर्तों का पालन करना पड़ता है. इस मामले में ट्रंप खुद को दे सकते हैं.
2023 का वह ‘सुरक्षा कवच’
ट्रंप की पिछली धमकियों को देखते हुए, अमेरिकी कांग्रेस ने दिसंबर 2023 में एक बेहद सख्त कानून पारित किया था. इस कानून का मकसद ही यही था कि कोई भी राष्ट्रपति अपनी मर्जी से एकतरफा अमेरिका को नाटो से बाहर न निकाल सके. नए नियमों के मुताबिक, अगर ट्रंप नाटो छोड़ना चाहते हैं, तो उन्हें दो रास्तों में से एक चुनना होगा. अमेरिका की सीनेट के 100 सदस्यों में से कम से कम 67 सदस्यों का समर्थन ट्रंप को जुटाना होगा.
आज की राजनीतिक स्थिति में इतने वोट जुटाना लगभग असंभव है.अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों को एक विशेष बिल पास करना होगा जिसमें नाटो से हटने की बात हो. ऐसा कर पाना अमेरिका के किसी भी राष्ट्रपति के लिए आसान नहीं, क्योंकि वहां व्यवस्था ही ऐसी है कि राष्ट्रपति के पास सर्वाधिक शक्ति नहीं होती.
क्या ट्रंप इस कानून को ‘बाईपास’ कर सकते हैं?
ट्रंप के पास इस कानूनी दीवार को तोड़ने के लिए कुछ रणनीतियां हो सकती हैं. जानकारों का मानना है कि ट्रंप इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जा सकते हैं. वे तर्क दे सकते हैं कि विदेश नीति और अंतरराष्ट्रीय संधियों पर अंतिम फैसला लेने का विशेषाधिकार राष्ट्रपति के पास है, संसद के पास नहीं. वे संसद के 2023 वाले कानून को असंवैधानिक घोषित कराने की कोशिश कर सकते हैं. अगर यह मामला अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट पहुंचता है, तो वहां ट्रंप की ओर से नियुक्त जजों का बहुमत उनके पक्ष में फैसला दे सकता है. अगर ट्रंप बिना संसद की परवाह किए नोटिस भेज देते हैं, तो अमेरिका में राष्ट्रपति और संसद के बीच एक बड़ा ‘संवैधानिक टकराव’ शुरू हो जाएगा. मामला कोर्ट में बरसों तक खिंच सकता है.
सॉफ्ट एग्जिट यानी बिना हटे बेकार करना
अगर कानूनी प्रक्रिया में ट्रंप फंस जाते हैं, तो वे नाटो को अंदर से खोखला करने का रास्ता चुन सकते हैं. इसके लिए उन्हें किसी की मंजूरी की जरूरत नहीं होगी. वे नाटो के बजट में अमेरिका का हिस्सा देना बंद कर सकते हैं. यूरोप विशेषकर जर्मनी और पोलैंड में तैनात अमेरिकी सैनिकों को वापस बुला सकते हैं. वे सार्वजनिक रूप से यह कह सकते हैं कि अगर रूस किसी नाटो देश पर हमला करता है, तो अमेरिका बचाने नहीं आएगा. ऐसा करने से नाटो बिना टूटे ही बेकार हो जाएगा.
मार्को रुबियो: जो कभी रक्षक थे, अब बदल गए?
इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प मोड़ विदेश मंत्री मार्को रुबियो का है. जब 2023 में नाटो की रक्षा वाला कानून बना, तो उसे बनाने वाले मुख्य लोगों में मार्को रुबियो शामिल थे. उन्होंने तब इसे अमेरिका की सुरक्षा के लिए जरूरी बताया था. अब ट्रंप सरकार में विदेश मंत्री बनने के बाद रुबियो के सुर बदल गए हैं. इस हफ्ते उन्होंने नाटो को एकतरफा रास्ता करार दिया है. उनका कहना है कि अमेरिका को अब इस गठबंधन पर फिर से विचार करना होगा.
2023 का कानून ट्रंप के पैरों में बेड़ियां
ट्रंप की यह धमकी फिलहाल एक प्रेशर टैक्टिक्स यानी दबाव बनाने की रणनीति ज्यादा लगती है. वे चाहते हैं कि यूरोपीय देश अपनी रक्षा पर ज्यादा पैसा खर्च करें और अमेरिका पर निर्भरता कम करें. हालांकि, 2023 का कानून ट्रंप के पैरों में बेड़ियां डालने जैसा है. जब तक उन्हें संसद का भारी समर्थन नहीं मिलता, अमेरिका कागजों पर नाटो का हिस्सा बना रहेगा. लेकिन एक राष्ट्रपति जो गठबंधन में विश्वास ही न रखता हो, उसकी मौजूदगी नाटो के अस्तित्व के लिए किसी बड़े खतरे से कम नहीं है.


