DGCA Safety Advisories: मध्य पूर्व में बढ़ते सैन्य तनाव के बीच डायरेक्टर जनरल ऑफ सिविल एविएशन (डीजीसीए) ने एडवाइजरी जारी कर सभी एयरलाइंस को 32 हजार फीट की (FL320) से अधिक ऊंचाई पर प्लेन उड़ाने की सलाह दी है. 19 मार्च 2026 को जारी इस सेफ्टी एडवाइजरी में डीजीसीए ने भारतीय एयरलाइंस को ईरान, इराक, इजराइल, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, ओमान, कतर, यूएई, सऊदी अरब और बहरीन के एयर स्पेस में उड़ान के दौरान सतर्क रहने के लिए का है.
खासतौर पर सऊदी अरब और ओमान के कुछ हिस्सों में 32,000 फीट से नीचे उड़ान न भरने की सलाह दी गई है. ऐसे में हर किसी के मन में बड़ा सवाल यही है कि आखिर जंग के साए के बीच प्लेन को 32 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ान भरने के लिए क्यों कहा जाता है? इस सवाल के जवाब से पहले बात करते हैं डीजीसीए के उस सेफ्टी एडवाइजरी की, जो बीते दिन सभी एयरलाइंस को जारी की गई. डीजीसीए ने इस एडवाइजरी में एयरलाइंस को किन-किन बातों को मानने के लिए कहा है.
डीजीसीए की सेफ्टी एडवाइजरी में एयरलाइंस को सलाह
- डीजीसीए ने 19 मार्च 2026 को यह सेफ्टी एडवाइजरी ऐसे समय में जारी की है जब अमेरिका और इजराइल के ईरान पर सैन्य हमलों के बाद पूरे मध्य पूर्व में तनाव तेजी से बढ़ गया है. वहीं ईरान की जवाबी कार्रवाई ने हालात बेहद गंभीर बना दिए हैं.
- इस एडवाइजरी में ईरान, इराक, इज़राइल, जॉर्डन, कुवैत, लेबनान, ओमान, कतर, यूएई, सऊदी अरब और बहरीन के हवाई क्षेत्र को जोखिम भरा बताया गया है, जहां नागरिक उड़ानों की सुरक्षा को लेकर विशेष सतर्कता बरतने को कहा गया है.
- डीजीसीए ने साफ किया है कि इन क्षेत्रों में मिसाइल अटैक, एयर डिफेंस सिस्टम, सैन्य गतिविधियों के कारण गलत पहचान, अचानक इंटरसेप्शन और तकनीकी या ऑपरेशनल चूक जैसी कई गंभीर सुरक्षा चुनौतियों का सामना कना पड़ सकता है.
- भारतीय एयरलाइंस को सलाह दी गई है कि वे इन एयर रूट्स से बचें और यदि उड़ान जरूरी हो तो पहले विस्तृत जोखिम का आकलन जरूर कर लें. नोटम्स (NOTAMs) पर नजर रखें तथा आपात स्थिति के लिए वैकल्पिक योजना तैयार रखें.
- इसके अलावा डीजीसीए ने सऊदी अरब और ओमान के कुछ हिस्सों में 32,000 फीट से नीचे उड़ान न भरने की हिदायत दी है और यह एडवाइजरी फिलहाल 28 मार्च 2026 तक लागू रहेगी, जिसे हालात के अनुसार आगे बढ़ाया जा सकता है.
आखिर 32000 फीट से ऊपर की ऊंचाई पर उड़ान भरने की क्यों दी गई है सलाह?
एविएशन एक्सपर्ट्स के मुताबिक, युद्ध के दौरान जमीन से हवा में मार करने वाली अधिकांश मिसाइलें और एयर डिफेंस सिस्टम सीमित ऊंचाई तक ही प्रभावी होते हैं. आमतौर पर ये सिस्टम 25 हजार से 30 हजार फीट तक के दायरे में ज्यादा सक्रिय रहते हैं. ऐसे में 32000 फीट से ऊपर उड़ान भरने पर प्लेन इन खतरों की पहुंच से काफी हद तक बाहर हो जाता है.
जंग के दौरान प्लेन की गलत पहचान का का खतरा किस तरह बनता है?
तनावपूर्ण हालात में सबसे बड़ा जोखिम मिसआइडेंटिफिकेशन यानी गलत पहचान का होता है. सैन्य रडार और एयर डिफेंस सिस्टम किसी भी उड़ती वस्तु को संभावित खतरे के रूप में देख सकते हैं. अगर कोई नागरिक प्लेन कम ऊंचाई पर उड़ रहा हो, तो उसे सैन्य प्लेन या ड्रोन समझे जाने की आशंका बढ़ जाती है. ऊंचाई बढ़ाने से यह जोखिम कम हो जाता है, क्योंकि कमर्शियल एयरलाइंस आमतौर पर उच्च ऊंचाई पर ही क्रूज करती हैं.
क्या अधिक ऊचाई पर उड़ान भरकर इंटरसेप्शन और अचानक हमले के खतरे से बचा जा सकता है?
एविएशन एक्सपर्ट्स के अनुसार, जंग के दौरान फाइटर जेट्स की गतिविधि बढ़ जाती है. कम ऊंचाई पर उड़ रहे कामर्शियल फ्लाइट्स के इंटरसेप्ट होने या सैन्य कार्रवाई की चपेट में आने का खतरा अधिक रहता है. 32000 फीट से ऊपर उड़ान भरने पर पायलट्स को अधिक सुरक्षित एयर कॉरिडोर मिल जाता है, जहां सैन्य गतिविधियां अपेक्षाकृत कम होती हैं.
32 हजार फीट की ऊंचाई पर उड़ने के तकनीकी और ऑपरेशनल फायदे क्या हैं?
एक्सपर्ट्स के ऊंचाई पर उड़ान भरने का एक बड़ा फायदा यह भी है कि वहां हवा पतली होती है, जिससे प्लेन कम फ्यूल में अधिक दूरी तय कर सकता है. हालांकि युद्ध के संदर्भ में यह प्राथमिक कारण नहीं है, लेकिन यह एक अतिरिक्त फायदा जरूर देता है. साथ ही, ऊंचाई पर एयर ट्रैफिक कंट्रोल के लिए बेहतर मॉनिटरिंग और रूट मैनेजमेंट संभव होता है.


