अमेरिका और इजरायल द्वारा मिलकर ईरान के खिलाफ छेड़े गए युद्ध को लेकर कई कई विश्लेषण सामने आ रहे हैं. युद्ध 13वें दिन में प्रवेश कर चुका है. अब कई विश्लेषण दावा कर रहे हैं कि इजरायल ने अमेरिका को इस संघर्ष में बुरी तरह फंसा दिया है. विश्लेषण कह रहे हैं इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने अमेरिकी हितों की बजाय इजरायल के विशेष उद्देश्यों को पूरा करने के लिए अमेरिका को युद्ध में खींच लिया.कई विशेषज्ञों का मानना है कि इजरायल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खतरे के रूप में पेश कर अमेरिका को युद्ध में उलझाया. वास्तव में इजरायल के हित कहीं और हैं वो इस युद्ध के जरिए सबको भटकाना चाहता है.
वास्तव में इजरायल का इस हमले के जरिए मुख्य उद्देश्य ईरान के साथ अमेरिकी कूटनीति को बाधित करना और गाजा में इजरायली कार्रवाइयों से वैश्विक ध्यान भटकाना था. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप को इजरायल की कार्रवाई में क्रेडिट लेने की चाहत ने फंसाया है. शुरू में तटस्थ रहने वाले ट्रंप अब ‘हम ईरान के आकाश पर पूर्ण नियंत्रण रखते हैं’ जैसे दावे कर रहे हैं, जो इजरायल की आक्रामकता को बढ़ावा दे रहा है. यह अमेरिका को एक लंबे अभियान में धकेल रहा है, जो अमेरिकी हितों को नुकसान पहुंचाएगा.
अमेरिका तरीके से ईरान का आंकलन नहीं कर सका
इजरायल और अमेरिका ने सोचा था कि ईरान जल्दी टूट जाएगा, लेकिन ईरानी मिसाइल हमलों और प्रॉक्सी समूहों की सक्रियता ने संघर्ष को क्षेत्रीय बना दिया. सुप्रीम लीडर अयातुल्ला खामेनेई की हत्या जैसे कदमों ने शिया मुसलमानों को एकजुट कर दिया. अमेरिकी ठिकानों पर हमले बढ़ा दिए. स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बंद होने से आधी से ज्यादा दुनिया ही अब मुश्किल में पड़ गई है.
वैश्विक अर्थव्यवस्था साफतौर पर कराहती हुई लगने लगी है. ईरान ने जिस तरह से खाड़ी के अमेरिकी सहयोगियों और कई अमेरिकी बेस पर मिसाइल से हमले किए, उसने सहयोगियों के होश गुल कर दिए हैं. जाहिर सी बात है कि वो अब अमेरिका पर युद्ध खत्म करने का दबाव बढ़ाने में लग गए हैं. इससे उन्हें अपना सबकुछ नष्ट होता लग रहा है.
नेतन्याहू ने सभी को खतरे में डाल दिया
रिस्पॉन्सिबल स्टेटक्राफ्ट के विश्लेषक लिखते हैं, “इजरायल अमेरिका को एक जाल में फंसा रहा है. परमाणु मुद्दा कभी मुख्य प्रेरणा था ही नहीं. कुल मिलाकर नेतन्याहू ने सभी को खतरे में डाल दिया है.”
पैलेस्टाइन क्रॉनिकल के विश्लेषक इनलेकेश लिखते हैं, वाशिंगटन और तेल अवीव के गलत अनुमानों ने युद्ध को बढ़ावा दिया, जिससे रणनीतिक हार निश्चित हो गई. ईरान की रणनीति ने इजरायली वायु रक्षा को थका दिया है.
ईरान लड़ाई को धीमी गति से बढ़ाएगा
गार्डियन में अली वायज लिखते हैं 28 फरवरी को जब अमेरिका और इज़राइल ने ईरान के खिलाफ समन्वित हमले शुरू किए तो लगा अमेरिका ईरान को उखाड़ फेंकेगा. लेकिन हुआ कुछ और ही.
ईरानी योजनाकार समझते हैं कि उनके मिसाइल और ड्रोन उत्पादन केंद्र ही अमेरिका के मुख्य टारगेट होंगे, ये लंबे समय तक बमबारी में टिक नहीं पाएंगे. लिहाजा हथियारों के भंडार को बड़े पैमाने पर नष्ट करने से बचना होगा. लड़ाई को धीमी गति से आगे बढ़ाना होगा. ईरान अब यही कर रहा है.
इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर महज एक सैन्य संस्था नहीं है. यह एक आर्थिक साम्राज्य, एक राजनीतिक शक्ति और एक वैचारिक स्तंभ है. ये गहराई से ईरान में समाया हुआ है. सही बात तो ये है कि अमेरिका और इजरायल दोनों ही ईरान के आंतरिक परिदृश्य का सही आंकलन नहीं कर सके. यहां तक कि कई ईरानी जो शासन का विरोध करते हैं और इसे उखाड़ फेंकने के लिए विदेशी सैन्य हस्तक्षेप चाहते थे, वे भी इसके बाद उत्पन्न होने वाली अराजकता के डर से राज्य के पूर्ण पतन को लेकर अनिच्छुक हैं. व्यवस्था में परिवर्तन चाहने और देश के टूटने की चाहत में अंतर होता है.
अमेरिका के लिए जोखिम भरा
वाशिंगटन इंस्टीट्यूट फॉर नियर ईस्ट पॉलिसी की रिसर्च डायरेक्टर, पूर्व यूएस डिप्टी असिस्टेंट सेक्रेटरी ऑफ डिफेंस डाना स्ट्रौल लिखती हैं कि इजरायल ने अमेरिका को ‘ट्रूली कम्बाइंड यूएस-इस्राएली मिलिट्री ऑपरेशन’ में फंसा दिया है, जहां दोनों देशों की खुफिया और सैन्य क्षमताएं पूरी तरह एकीकृत हो गई हैं. यह अमेरिका के लिए जोखिम भरा है क्योंकि इजरायली जनता युद्ध का समर्थन करती है, लेकिन अमेरिकी जनमत इसके खिलाफ है. इससे अमेरिकी सैनिकों और अर्थव्यवस्था को नुकसान हो सकता है.
अमेरिकी हस्तक्षेप उसे ही नुकसान कर सकता है
ईरान एक्सपर्ट और ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की सुजैन मलोनी लिखती हैं, इजरायली हमलों ने ईरान को पड़ोसी देशों पर हमले करने के लिए मजबूर किया, जो अमेरिका को वैश्विक अर्थव्यवस्था और सहयोगियों की सुरक्षा में फंसा रहा है. ईरानी शासन कमजोर दिखने के बावजूद लचीला है और अमेरिका का हस्तक्षेप उसे नुकसान पहुंचाने वाला साबित हो सकता है.
युद्ध लंबे समय तक अमेरिका को फंसा सकता है
तेल अवीव यूनिवर्सिटी के पूर्व प्रेसिडेंट और मिडिल ईस्ट विशेषज्ञ तमर रबिनोविच का कहना है कि इजरायल की आक्रामकता ट्रंप की ‘क्विक एंड’ इच्छा से टकरा रही है, जो अमेरिका-इजरायल संबंधों को खराब कर सकती है. गल्फ देशों पर ईरानी हमले अमेरिकी ठिकानों को खतरे में डाल रहे हैं. ब्रुकिंग्स इंस्टीट्यूशन की ही डिफेंस पॉलिसी विशेषज्ञ मारिया कार्लिन लिखती हैं कि ये युद्ध अमेरिका को लंबे समय तक फंसा सकता है.
गल्फ देश इजरायल को क्षेत्रीय खतरा मानने लगे हैं
न्यूयॉर्क टाइम्स में एक कॉलम में लिखा गया है, गल्फ देश अब इजरायल को भी क्षेत्रीय खतरा मानने लगे हैं, क्योंकि उसके हमलों ने ईरान को उकसाया और अमेरिकी संरक्षण को कमजोर किया. इससे अमेरिका की कूटनीति विफल हो रही है.
खुद अमेरिकी जनता भी ऐसा ही मान रही है. ये बात कई हालिया पोल्स से भी जाहिर हो रही है. इसी महीने हुए कई हालिया पोल्स बताते हैं कि इजरायल की भूमिका को “ट्रिगर” या “ट्रैप” की रही है. इससे अमेरिकी हितों का नुकसान होगा.
X पर हालिया पोस्ट्स में कुछ अमेरिकी यूजर्स कह रहे हैं कि “इजरायल ने अमेरिका को ईरान युद्ध में फंसा दिया”. कैजुअल्टीज बढ़ने पर जनमत और खिलाफ हो जाएगा. अगर युद्ध लंबा चला तो विरोध बढ़ सकता है. कई यूजर्स ये कह रहे हैं कि इजरायल आराम से बैठा है और सारा नुकसान अब अमेरिका झेल रहा है. कई यूजर्स ने ये लिखा कि अमेरिका से सोचा भी नहीं रहा होगा कि ईरान उसको इस तरह से जवाब देकर तगड़ा झटका दे सकता है.


