एक तरफ दुनिया राहत की सांस ले रही थी कि चलो महायुद्ध टल गया, सीजफायर हो गया. लेकिन अब जो खबर अमेरिका से निकलकर आ रही है, उसने पूरी कहानी में ट्विस्ट डाल दिया है. व्हाइट हाउस ने साफ-साफ कह दिया है कि जो ईरान की मीडिया ढोल पीटकर बता रही है, वो असली डील है ही नहीं. ईरान ने अपनी जनता को खुश करने के लिए जो 10 पॉइंट वाला विजय पत्र जारी किया है, व्हाइट हाउस के मुताबिक वो बकवास है. अमेरिका के पास जो फाइल पहुंची है, उसमें तो कुछ और ही लिखा है.
सीजफायर के बाद ईरान की सरकारी न्यूज़ एजेंसी ‘फ़ार्स’ ने एक लिस्ट जारी की. इसमें उन्होंने दावा किया कि अमेरिका ने ईरान 10 शर्तें मान ली हैं और घुटने टेक दिए हैं. इसमें पहली शर्त ही ये थी कि ईरान और उसके जितने भी साथी ग्रुप हैं, उनके खिलाफ हर तरह की आक्रामकता यानी मार-काट तुरंत बंद की जाए. इतना ही नहीं, ये भी लिखा था कि अमेरिकी फौज अपना बोरिया-बिस्तर समेटे और इस इलाके से नौ दो ग्यारह हो जाए. ऊपर से एक शर्त ये भी ठोक दी कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज पर ईरान की निगरानी रहेगी और वो तय करेगा कि कौन सा जहाज कब निकलेगा.
जब व्हाइट हाउस हुआ फायर
लेकिन जैसे ही ये खबरें वायरल हुईं, व्हाइट हाउस का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया. बीबीसी की खबर के मुताबिक, व्हाइट हाउस के एक सीनियर अधिकारी ने तुरंत मोर्चा संभाला और सीधे लफ्जों में कह दिया कि जो दस्तावेज मीडिया में घूम रहा है, वो वर्किंग फ्रेमवर्क यानी काम करने वाला ढांचा है ही नहीं. अमेरिका ने दो टूक कह दिया कि हम पर्दे के पीछे चल रही बातचीत का सम्मान करते हैं, इसलिए सार्वजनिक तौर पर मोलभाव नहीं करेंगे, लेकिन इसका मतलब ये कतई नहीं है कि जो ईरान कह रहा है वो सच है. मतलब साफ है, वाशिंगटन के पास जो फाइल है और तेहरान जो शोर मचा रहा है, दोनों के बीच जमीन-आसमान का फर्क है.
लेबनान पर सस्पेंस
इस पूरे ड्रामे में सबसे बड़ा सस्पेंस लेबनान को लेकर बना हुआ है. जब व्हाइट हाउस से सीधा सवाल पूछा गया कि क्या लेबनान भी इस डील का हिस्सा है? क्या वहां भी बमबारी रुकेगी? तो जवाब में सिर्फ सन्नाटा मिला. व्हाइट हाउस ने इस पर चुप्पी साध ली. अब इस चुप्पी के हजार मतलब निकाले जा रहे हैं. पाकिस्तान के पीएम शाहबाज शरीफ कह चुके हैं कि सीजफायर सब जगह लागू है, लेकिन ट्रंप और नेतन्याहू के करीबियों के तेवर बता रहे हैं कि लेबनान में खेल अभी जारी रहेगा.
तो 10 प्वाइंट एजेंडा था क्या?
ईरान ने जो 10 शर्तें बताई थीं, उसमें ईरान चाहता है कि उस पर लगे सारे छोटे-बड़े प्रतिबंध हटा दिए जाएं. इतना ही नहीं, वो तो ये भी मांग कर रहा है कि एक मोटा फंड बनाया जाए जिससे उसे हुए नुकसान की भरपाई की जाए. परमाणु कार्यक्रम को लेकर भी ईरान ने चालाकी दिखाई है. उसने कहा कि हम बम तो नहीं बनाएंगे, लेकिन यूरेनियम एनरिचमेंट का हमारा हक अमेरिका को मानना पड़ेगा. उधर अमेरिका इस बात पर अड़ा है कि ईरान की परमाणु क्षमता को कैसे काबू में रखा जाए.
मोजतबा खामेनेई करा रहे थे डील
इस पूरी बातचीत के दौरान मोजतबा खामेनेई का नाम पहली बार उछला है. कहा जा रहा है कि पर्दे के पीछे असली कमान उन्हीं के हाथ में थी और जब ट्रंप ने जब ‘सभ्यता मिटाने’ की धमकी दी, तब मोजतबा ने ही अपने वार्ताकारों को डील की तरफ बढ़ने का इशारा किया. लेकिन समस्या ये है कि ईरान की सेना यानी IRGC के कट्टरपंथियों को ये समझौता हजम नहीं हो रहा. इसीलिए शायद अराघची जैसे मंत्री और मोजतबा खामेनेई इस समझौते को ईरान की जनता के सामने एक बड़ी जीत की तरह पेश कर रहे हैं, भले ही असलियत में उन्हें कई मोर्चों पर झुकना पड़ा हो.


