कचनरवा में बेटियों का बोलबाला — मासिक धर्म को लेकर जागरूकता की नई शुरुआत

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कचनरवा में जागी बेटियों की चेतना — माहवारी पर टूटी चुप्पी, मिली नई सोच की राह |

📍कचनरवा, कोन / सोनभद्र |🖊 संवाददाता – राजन जायसवाल

सामाजिक चुप्पियों को तोड़ने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उस समय दर्ज हुआ जब सोनभद्र के ग्राम पंचायत कचनरवा स्थित आदर्श पब्लिक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय में मासिक धर्म जागरूकता अभियान का आयोजन किया गया। इस आयोजन में न सिर्फ सैकड़ों किशोरियों ने भाग लिया, बल्कि पहली बार उन्होंने खुलकर सवाल भी पूछे — वह भी उस विषय पर, जिस पर अक्सर घरों में बात करना भी वर्जित माना जाता है।

✨ अभियान की मूल भावना — ‘माहवारी शर्म नहीं, समझदारी है’

यह आयोजन डिजिटल साथी फाउंडेशन, मिलान फाउंडेशन और प्रोजेक्ट बाला के संयुक्त प्रयास से संपन्न हुआ। उद्देश्य था – माहवारी जैसे प्राकृतिक जैविक चक्र को लेकर समाज में फैले भ्रम, डर और शर्म को तोड़ना और किशोरियों को वैज्ञानिक, भावनात्मक और सामाजिक दृष्टि से जागरूक बनाना।

🧕 किशोरियों ने सीखा खुलकर जीना, बिना शर्म के बोलना

कार्यक्रम में प्रशिक्षक काजल कुमारी और स्मिता तिवारी ने बेहद सहज और आत्मीय तरीके से बालिकाओं को समझाया कि:

> “माहवारी कोई कमजोरी नहीं, यह नारी शक्ति का प्रतीक है। इस पर बात करना ज़रूरी है, चुप रहना नहीं।”

उन्होंने साफ-सफाई, पुन: उपयोग योग्य सेनेटरी पैड, संतुलित आहार, और मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े अहम बिंदुओं को सरल भाषा में समझाया।

🎤 जब बेटियों ने पहली बार खुद पूछा — तब समाज ने पहली बार सुना

विद्यालय के प्रबंधक धनंजय कुमार तिवारी ने कहा:

> “यह पहला अवसर था जब हमारे विद्यालय की छात्राएं किसी संवेदनशील विषय पर इतनी सहजता और खुलापन के साथ अपनी जिज्ञासाएं रख रही थीं। हमें खुशी है कि हम इस बदलाव का हिस्सा बने।”

वहीं डिजिटल साथी फाउंडेशन के संस्थापक वेद प्रकाश ओझा ने कहा:

> “ऐसे कार्यक्रम सामाजिक बदलाव की नींव रखते हैं। जब बेटियाँ आत्मनिर्भर और जागरूक होंगी, तभी समाज आगे बढ़ेगा।”

🎁 सेनेटरी पैड वितरण — सिर्फ सुविधा नहीं, आत्मबल का प्रतीक

कार्यक्रम के अंत में सैकड़ों लड़कियों को नि:शुल्क सेनेटरी पैड वितरित किए गए। इससे उन लड़कियों को जहां व्यवहारिक सहारा मिला, वहीं यह उनके लिए एक मनोवैज्ञानिक संबल भी बना।

🔍 समाज के लिए बड़ा संदेश

माहवारी पर चुप रहना नहीं, समझदारी से बात करना ज़रूरी है।

गांव की बेटियाँ अब जागरूक हो रही हैं और अपनी बात कहने लगी हैं।

शिक्षा संस्थानों को ऐसे आयोजन नियमित रूप से करने चाहिए।

स्वास्थ्य, स्वच्छता और सम्मान – तीनों जरूरी हैं बेटियों के लिए।

📣 निष्कर्ष — जब बेटियाँ बोलेंगी, तभी समाज बदलेगा

कचनरवा में हुआ यह आयोजन कोई साधारण कार्यक्रम नहीं था — यह एक सोच का बदलाव, एक संवाद की शुरुआत, और सशक्त समाज की नींव रखने का कार्य था।

अब समय है कि हम सिर्फ शहरी नहीं, ग्रामीण भारत की बेटियों को भी वही हक दें — बोलने का, समझने का और सम्मान से जीने का।

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